सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी जिसमें एक न्यायिक अफसर की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उसे बहाल करने का निर्देश दिया गया था। इस न्यायिक अफसर पर आरोप था कि उसने ट्रेन में हंगामा किया, महिला यात्री के सामने अश्लील हरकत की और ट्रेन के डिब्बे में पेशाब भी की।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक अफसर का इस तरह का बर्ताव बेहद खराब है और उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए था। अदालत ने कहा कि यह मामला हैरान करने वाला है और अफसर का व्यवहार बेहद घिनौना था।
जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि उसने डिब्बे में पेशाब की, वहां एक महिला भी मौजूद थी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस मेहता की बेंच ने इस मामले में सुनवाई की। सुनवाई के दौरान इस मामले में प्रतिवादी (हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल) की ओर से पेश हुए वकील ने अदालत को बताया कि इस अफसर की मेडिकल जांच रिपोर्ट बताती है कि वह घटना के वक्त नशे में नहीं था।
‘क्या आप उम्मीद करते हैं अदालत इसे चुपचाप सह लेगी?
क्या है यह पूरा मामला?
मामला यह है कि मध्य प्रदेश में सिविल जज (द्वितीय श्रेणी) को 2018 में ट्रेन में उपद्रव करने के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया था। उन पर नशे की हालत में ट्रेन में बैठे दूसरे यात्रियों के साथ गलत व्यवहार करने और कंडक्टर/टीटीई को गाली देने का आरोप था।
आरोपों के अनुसार, सिविल जज ने एक महिला यात्री के सामने अश्लील हरकत की और सीट पर पेशाब की। उन्होंने ट्रेन में बैठे लोगों को अपना पहचान पत्र दिखाकर धमकाया भी था।
यह भी आरोप है कि वह बिना किसी अनुमति या जिला न्यायाधीश/कंट्रोलिंग अफसर को बताए बिना ही इस यात्रा पर जा रहा था। इस घटना के बाद न्यायिक अफसर के खिलाफ दो कार्यवाही (आपराधिक और विभागीय) शुरू की गईं। गिरफ्तारी के बाद उन्हें जमानत मिल गई लेकिन उन्होंने इस घटना के बारे में अपने कंट्रोलिंग अफसर को नहीं बताया।
आपराधिक कार्यवाही में उन्हें बरी कर दिया गया क्योंकि गवाह (जिनमें TTE और पीड़ित यात्री शामिल थे) मुकर गए। लेकिन विभागीय कार्यवाही के दौरान कई लोगों ने सिविल जज के अश्लील बर्ताव, अधिकारों के दुरुपयोग के बारे में बताया।
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जांच में सही पाए गए आरोप
जांच अधिकारी द्वारा आरोपों को सही पाए जाने पर प्रशासनिक समिति ने सिविल जज को पद से हटाने की सिफारिश की। हाई कोर्ट की फुल बेंच ने जज को सुनाई गई सजा को मंजूरी दे दी और राज्यपाल ने उनके खिलाफ बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया।
इसके खिलाफ सिविल जज ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने राज्यपाल के द्वारा जारी किए गए नौकरी से बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया और उसकी बहाली का निर्देश दिया।
रजिस्ट्रार जनरल ने दी थी आदेश को चुनौती
हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने इस आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि घटना के समय न्यायिक अफसर ने जिस तरह का बर्ताव किया, वह एक जज के लिए पूरी तरह गलत था। इस घटना को लेकर मीडिया में खबरें आई जिससे न्यायपालिका की गरिमा को नुकसान पहुंचा।
