सुप्रीम कोर्ट में कथित तौर पर कैश कांड के आरोपी न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की जा रही है, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही संसदीय समिति की वैधता को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष ने राज्यसभा अध्यक्ष से परामर्श किए बिना एकतरफा रूप से किया था।
न्यायमूर्ति यशवंत की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया कि कानून के अनुसार, जब संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन कोई प्रस्ताव पेश किया जाता है, तो कोई समिति तब तक गठित नहीं की जा सकती जब तक कि प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार न हो जाए और अध्यक्ष एक संयुक्त समिति का गठन न कर दें।
अधिवक्ता ने दिया अपना तर्क
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, “इस मामले में यह स्पष्ट है कि राज्यसभा के उपसभापति ने 11 अगस्त, 2025 को प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। 21 जुलाई को प्रस्ताव पेश किया गया था। उसी दिन शाम को अध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया था। 11 अगस्त को उपसभापति ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।”
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यसभा और लोकसभा को जारी किया था नोटिस
जस्टिस यशवंत वर्मा ने 16 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में महाभियोग प्रक्रिया को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर सुनवाई करते हुए लोकसभा और राज्यसभा के सचिवालयों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा था।
जानकारी दे दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के नई दिल्ली स्थित सरकारी आवास से जला कैश बरामद हुआ था। इसके बाद लोकसभा स्पीकर की ओर से तीन सदस्यीय जांच कमेटी का गठन कर दिया गया था।
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