संदीप भूषण
भारतीय खेल जगत में अभी क्या चल रहा है? ज्यादातर लोगों के जवाब वेस्ट इंडीज में चल रहे टैस्ट चैंपियनशिप में जसप्रीत बुमराह की हैट्रिक से शुरू होकर निशानेबाजी में ओलंपिक कोटा और विश्व चैंपियनशिप की अन्य उपलब्धियों तक सीमित हो जाएंगे। उन्हें इससे बाहर झांकने का मौका ही नहीं। सभी 2020 तोक्यो ओलंपिक के लिए कोटा हासिल करने और उसके लिए तैयारियों का बखान करने में लगे हैं। सभी का ध्यान ओलंपिक काउंटडाउन पर ही है। उन्हें कोई इल्म ही नहीं कि भारत में भी 2020 में एक खेल महोत्सव का आयोजन होना है। हां, एक बात है कि लगभग सवा सौ करोड़ की जनसंख्या वाले देश ने इस सवाल से मुंह मोड़ना बेहतर सीख लिया है, भारत फीफा विश्व कप में कब खेलेगा? इसका जवाब न तो सरकार के पास है और न ही भारत में फुटबॉल का संचालन कर रही संस्था के पास। रोजाना कहीं न कहीं किसी स्तर पर फुटबॉल टूर्नामेंट का आयोजन तो किया जा रहा है लेकिन हमारे खिलाड़ी अब तक एशियाई टीमों से मुकाबला करने में भी पूरी तरह सक्षम नहीं हो पाए हैं। आखिर ऐसा क्यों है कि अफ्रीकी और दक्षिणी अमेरिकी देश कम संसाधन के बावजूद फुटबॉल की दुनिया में राज कर रहे हैं लेकिन भारत काफी पीछे हैं। इसी की पड़ताल करती यह रिपोर्ट…
भारत फीफा विश्व कप में कब खेलेगा? कौन देगा
भारत के दिग्गज फुटबॉलरों में शुमार बाईचुंग भूटिया से जब पूछा गया कि भारत फीफा विश्व कप में कब खेलेगा? उनका जवाब था, जब तक हम अपने देश में मजबूत खेल संस्कृति और फुटबॉल संस्कृति का विकास नहीं करेंगे तब तक यह संभव नहीं। उन्होंनें कहा कि भारत में मजबूत खेल संस्कृति की जगह मजबूत क्रिकेट संस्कृति है। भूटिया का यह जवाब सही भी है लेकिन क्या क्रिकेट ने ही फुटबॉल को आगे बढ़ने से रोका है? क्या कोई खेल किसी दूसरे खेल के विकास में बाधक बन सकता है? इसका जवाब है नहीं।
दरअसल, चार दशक से यह जरूर हुआ कि क्रिकेट ने भारतीय युवाओं को आकर्षित किया है लेकिन यह कहना गलत होगा कि उसने अन्य खेलों के विकास में बाधा पहुंचाई है। क्रिकेट ने सिर्फ खुद को मजबूत किया और अन्य खेल अपने आप ही कमजोर होते चले गए। इसका मुख्य कारण रहा पैसा। क्रिकेट ने अपने खिलाड़ियों को हर संभव मदद दी। उन्हें नाम दिया। उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया। वहीं फुटबॉल में न तो पैसा आया और न ही सरकार ने मदद के लिए कदम आगे बढ़ाया। नतीजा हुआ कि फुटबॉल के लिए चर्चित बंगाल, गोवा, केरल, पंजाब, कर्नाटक, महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों में भी खेल की हालत अच्छी नहीं है। ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि हजारों क्लब बंद हो चुके हैं। जो बचे हैं उन्हें चलाना मुश्किल हो रहा है। एक समय मोहन बागान, ईस्ट बंगाल, मोहम्मडन स्पोर्टिंग, गोरखा ब्रिगेड आदि क्लबों की तूती बोलती थी लेकिन आज उनकी हालत खस्ता है। साथ ही आइएसएल और आइ लीग के आने से पुराने टूर्नामेंटों की रंगत भी फीकी पड़ने लगी है।
कुछ कदम चले हैं
किसी देश को अपने यहां खेल संस्कृति को मजबूत करने के लिए बच्चों और युवाओं की जरूरत होती है। भारत में इसकी कोई कमी नहीं। लेकिन, 1983 क्रिकेट विश्व कप के बाद देश के ज्यादातर राज्यों में उन्होंने अपने आसपास क्रिकेट को ही पाया है। टीवी हो या अखबार सबमें क्रिकेट की महत्ता ज्यादा है। युवाओं को भी लगता है कि क्रिकेट में उनका करिअर तेजी आगे बढ़ सकता है। हालांकि पांच सालों में बदलाव की बयार चली है। ऐसा नहीं है क्रिकेट कमजोर हुआ लेकिन यह है कि फुटबॉल कुछ आगे बढ़ा। 2017 में फीफा अंडर-17 विश्व कप ने इस चिराग को हवा दी। सुनील छेत्री की अगुआई में भारत की राष्ट्रीय टीम ने कई मुकाम हासिल किए। देश में फुटबॉल के बढ़ते प्रशंसकों की संख्या ने ही उसे महिला फीफा अंडर-17 विश्व कप की मेजबानी दिलाई।
अब इन पर ही दारोमदार
हम इस बात से मुंह नहीं मोड़ सकते कि भारत में फुटबॉल को दोबारा मुख्य धारा में लाने में प्रीमियर लीगों की भूमिका अहम रही। आइएसएल हो या आई लीग, सबने मिलकर एक नई पीढ़ी को तैयार करना शुरू किया है। 2013 में शुरू हुए आइएसएल को 155 मिलियन प्रशंसक फॉलो करते हैं। इसका मतलब हुआ कि यह दुनिया में सबसे ज्यादा देखा जाने वाला पांचवां फुटबॉल लीग है। इसके अलावा स्कूल और कॉलेज स्तर पर भी अब फुटबॉल टूनार्मेंट का आयोजन फिर से किया जाने लगा है। हालांकि एक संकट यह है कि बड़े-बड़े लीगों के आयोजन के बाद भी पुराने क्लबों को संजीवनी नहीं मिल रही है। इसका नुकासान है कि छोटे-छोटे गांव और दूर दराज के इलाकों की प्रतिभाएं बड़े लीगों तक का सफर नहीं कर पा रही। अगर हर राज्य में क्लबों की संख्या होगी तो युवाओं को ज्यादा मौके मिलेंगे।
पैसा और करिअर लेकिन सिर्फ बड़ी लीग तक
यह सच है कि भारत की सबसे बड़ी फुटबॉल लीग इंडियन सुपर लीग (आइएसएल) के आने से अब खिलाड़ियों के पास पैसे की कमी नहीं रही। साथ ही वे इस खेल में अपना भविष्य भी देख रहे हैं। कॉरपोरेट जगत भी प्रशंसकों की संख्या को देखते हुए खूब पैसे लगा रहा है। यही नहीं भारतीय खेल बाजार को देखते हुए दुनिया के दिग्गज लीग मालिक और क्लबों ने यहां पैसा लगाना शुरू कर दिया है। ला लीगा देश के आठ राज्यों में लगभग 10,000 बच्चों को फुटबॉल की ट्रेनिंग दे रहा है। आइएसएल में दक्षिण भारत के फिल्मी सुपरस्टार चिरंजीवी और नागार्जुन सहित बॉलीवुड के रनबीर कपूर और सलमान खान जैसे दिग्गजों ने पैसा लगाया है। वहीं इस भरतीय क्रिकेट के सरताज विराट कोहली भी पीछे नहीं हैं और उन्होंने भी आइएसएल में निवेश किया है। लेकिन यहां भी वही सवाल है कि ये सभी पुराने क्लबों में निवेश क्यों नहीं करते? आखिर ऐसा क्या है जो उन्हें वहां पैसे लगाने से रोकता है। अगर, इस स्तर पर फुटबॉल का विकास हो गया तो वो दिन दूर नहीं जब भारत भी फीफा विश्व कप के लिए क्वालीफाई करने के काबिल हो जाएगा।
