एशेज में ऑस्ट्रेलिया के हाथों 4-1 से करारी हार के बाद इंग्लैंड की ‘फियरलेस क्रिकेट’ की परिभाषा पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। कभी आक्रामकता के नाम पर तारीफ बटोरने वाली इंग्लिश टीम अब लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना क्रिकेट का प्रतीक बनती जा रही है।

महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर ने अपने ताजा कॉलम में इंग्लैंड की इसी सोच पर करारा प्रहार करते हुए इसे ‘फियरलेस नहीं, फिकरलेस क्रिकेट’ करार दिया है और बताया है कि आखिर क्यों बैजबॉल (ब्रेंडन मैकुलम बेन स्टोक्स) युग की चमक अब फीकी पड़ चुकी है।

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सुनील गावस्कर ने लिखा, ‘जब भी कप्तान, कोच या चयन समिति बदली जाती है तो उम्मीद होती है कि नए आइडिया आएंगे, नई पहलें होंगी और बेहतर नतीजे मिलेंगे। यह बदलाव तब होता है जब कोचिंग स्टाफ या चयन समिति का कार्यकाल खत्म हो जाता है और नई टीम को चुना जाना होता है।’

इंग्लैंड कागजी शेर

इंग्लैंड का प्रदर्शन ज्यादातर खेलों में बहुत निराशाजनक होता है, खासकर उन लोगों की लिखी बातों के मुकाबले जिन्होंने शायद ही कभी सबसे ऊंचे स्तर पर कोई खेल खेला हो, इसलिए निराशा तब और भी ज्यादा होती है जब टीमें दिखाती हैं कि वे असली नहीं, बल्कि कागजी शेर हैं।

यही वजह है कि इंग्लैंड का ऑस्ट्रेलिया से 4-1 के अंतर से हारना गैर-अंग्रेजों के लिए कोई हैरानी की बात नहीं थी। मेहमान टीमों के लिए कहीं भी टेस्ट सीरीज जीतना बहुत मुश्किल होता है, खासकर ऑस्ट्रेलिया और भारत में। हालांकि, भारत को खुद भी 2024 में न्यूजीलैंड और पिछले साल के आखिर में साउथ अफ्रीका ने बुरी तरह हराया था।

मैकुलम का अहसान माने बीसीसीआई

ब्रेंडन मैकुलम को कुछ साल पहले इंग्लैंड का कोच बनाया गया था। वह एक शानदार क्रिकेटर थे। बीसीसीआई (BCCI) को हमेशा उनका अहसानमंद रहना चाहिए कि उन्होंने पहले मैच में ही छक्कों से सजी 158 रनों की पारी खेलकर इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) को इतनी शानदार शुरुआत दी। यह ठीक वैसी ही पारी थी जिसकी जरूरत थी ताकि संदेह करने वाले लोग चौकन्ने हो जाएं और भारतीय क्रिकेट के इस नए प्रोडक्ट पर ध्यान दें।

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मीडिया आज जिसे ‘फियरलेस क्रिकेट’ कहता है, वह अक्सर ‘फिकरलेस (लापरवाह) क्रिकेट’ जैसा लगता है। सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट की गारंटी और क्रिकेट की दुनिया भर में अलग-अलग T20 लीग होने से, खाने-पीने की चिंता नहीं रहती, जबकि पहले ऐसा नहीं था जब ये सुविधाएं नहीं थीं और टेस्ट टीम से बाहर होने का मतलब था बोरिंग फर्स्ट-क्क्लास क्रिकेट में लौटना, जहां मुश्किल से ही कोई इतना कमा पाता था कि बचत कर सके।

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि मौजूदा क्रिकेटरों से कोई जलन है। बिल्कुल नहीं। जैसा कि सर डॉन ब्रैडमैन ने कहा था, ‘हर क्रिकेटर की कोशिश होनी चाहिए कि वह खेल को उससे बेहतर स्थिति में छोड़े, जैसा उसने पाया था, इसलिए जब आज का क्रिकेटर अच्छा पैसा कमाता है, तो यह बहुत अच्छी बात है, क्योंकि यह ज्यादा युवाओं को खेल के लिए प्रोत्साहित करता है और आकर्षित करता है।

सुनील गावस्कर ने लिखा, ‘…इसीलिए यह निराशाजनक होता है जब कुछ लोग खेल के प्रति अपनी जिम्मेदारी भूल जाते हैं और लापरवाह क्रिकेट खेलते हैं, जिससे वे अपनी टीम और देश को निराश करते हैं। जीतना और हारना खेल का हिस्सा है, लेकिन कोशिश पूरी दिल से होनी चाहिए।’

एशेज में दिल से नहीं खेले अंग्रेज

दिग्गज भारतीय ने लिखा, ‘इंग्लैंड टीम के कितने खिलाड़ी, जो एशेज सीरीज हारे, अपने दिल पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि उन्होंने सीरीज में अपना सब कुछ दिया, न सिर्फ शारीरिक रूप से बल्कि, इससे भी ज्यादा जरूरी, मानसिक रूप से? आप मुझे बताइए।’

ब्रेंडन मैकुलम इंग्लैंड के क्रिकेट में वही ताजगी लाए और इससे बाकी क्रिकेट जगत हैरान रह गया। उनका बोरिंग, सुस्त क्रिकेट खत्म हो गया था और अचानक विरोधी टीमों को समझ नहीं आ रहा था कि इसका सामना कैसे करें।

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हालांकि, तथाकथित मिस्ट्री गेंदबाजों की तरह, यह सरप्राइज भी खत्म हो गया। जब टीमों को अहसास हुआ कि जब भी गेंद घूमती है तो इंग्लैंड के पास इसका बहुत कम जवाब होता है। बशर्ते पिचें सपाट न हों, तो समस्याएं साफ दिखने लगीं। जब वे विदेश में होते थे, तो उनका मीडिया पिचों के बारे में बहाने बनाता था।

बल्लेबाजों ने अपना तरीका बदलने और स्थिति के अनुसार बल्लेबाजी करने से मना कर दिया। मैनेजमेंट भी बल्लेबाजों द्वारा खेले गए कुछ माफ न किए जा सकने वाले और गैर-जिम्मेदाराना शॉट्स को नजरअंदाज कर रहा था, इसलिए टीम से बाहर होने का डर बिल्कुल नहीं था।

जो रूट का प्रदर्शन सराहनीय

अपने देश के लिए खेलने को अहमियत देना और अपनी विकेट पर कम से कम एक सेंचुरी की कीमत लगाना, यह सिर्फ महान जो रूट ही करते हैं। बाकी खिलाड़ियों को कोई फर्क नहीं पड़ता था, क्योंकि उन्हें पता था कि उन्हें टीम से बाहर नहीं किया जाएगा। IPL 2026: इन दो शहरों में हो सकते हैं आरसीबी के घरेलू मैच, यहां खेल सकती है राजस्थान रॉयल्स