दिल्ली के तुर्कमान गेट में एमसीडी के द्वारा अतिक्रमण हटाने की हालिया कार्रवाई को लेकर विवाद हुआ। अतिक्रमण हटाने के विरोध में स्थानीय लोगों ने पत्थरबाजी की और इसके बाद पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। इस घटना ने इमरजेंसी के दौरान हुई कुछ घटनाओं की याद को ताजा कर दिया है।

तुर्कमान गेट का इलाका पुरानी दिल्ली की घनी गलियों के बीच बसा है। तुर्कमान गेट चौकोर और सादे, जर्जर पत्थर और प्लास्टर से बना हुआ है और इसे मुगल काल में बनाया गया था। तुर्कमान गेट भारत के इतिहास में अहम स्थान रखता है।

आपको यह जानकर निश्चित तौर पर हैरानी होगी कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी 1976 में तुर्कमान गेट आए थे और इसके बाद यहां बहुत बड़े पैमाने पर बुलडोजर ने तोड़फोड़ की थी।

आइए, तुर्कमान गेट के इतिहास से जुड़ी कुछ बातों के बारे में जानते हैं।

शाहजहां के शासनकाल में बनाया गया तुर्कमान गेट

तुर्कमान गेट को 17वीं शताब्दी में मुगल सम्राट शाहजहां के शासनकाल में बनाया गया था। तब शाहजहां ने शाहजहानाबाद को अपनी राजधानी बनाया था। इस जगह का ऐतिहासिक महत्व मुगल काल से भी पुराना है और इसकी जड़ें उस दौर में हैं जब दिल्ली सूफीवाद का प्रमुख केंद्र थी।

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इतिहासकार स्वप्ना लिडल अपनी किताब Chandni Chowk: The Mughal City of Delhi (2017) में लिखती हैं कि शाहजहानाबाद को खाली जमीन पर नहीं बसाया गया था। इसमें पुरानी बस्तियों, दरगाहों और सड़कों को भी शामिल किया गया।

द इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में लिडल ने बताया था कि उत्तर-पश्चिम में फतेहपुरी मस्जिद से तुर्कमान गेट तक जाने वाली सड़क अहम रास्ता थी, जिसके किनारे पुरानी इमारतें मौजूद थीं।

शाह तुर्कमान को दफनाया गया

लिडल ने बताया, “इसी सड़क के किनारे शाह तुर्कमान बयाबानी नाम के एक सूफी संत रहते थे और उन्हें यहीं दफनाया गया था।” उनकी दरगाह हौज काजी जाने वाली सड़क पर बनाई गई है। दरगाह के बगल में रजिया सुल्तान की कब्र है। रजिया सुल्तान 13वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत पर शासन करने वाली पहली और एकमात्र महिला शासक थीं।

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क्यों कहा गया तुर्कमान गेट?

जब शाहजहानाबाद के शहर की दीवारों को बनाया गया तो पुराने वाले इलाके इन दीवारों के अंदर आ गए। शाह तुर्कमान की दरगाह के सबसे नजदीक बने दरवाजे को तुर्कमान दरवाजा या तुर्कमान गेट कहा गया।

तुर्कमान गेट विद्रोह, औपनिवेशिक शासन और बंटवारे के दौरान हुई उथल-पुथल में भी सुरक्षित रहा। 1857 के विद्रोह के बाद, ब्रिटिश अधिकारियों ने तुर्कमान गेट के दोनों ओर की शहर की दीवारों के कुछ हिस्सों को गिरा दिया। 20वीं शताब्दी की शुरुआत में, दीवारों के और भी हिस्सों को हटाया गया लेकिन तुर्कमान गेट खड़ा रहा।

संजय गांधी का ‘सुंदरीकरण’ अभियान

1970 के दशक के मध्य में तुर्कमान गेट राजनीतिक सुर्खियों में आ गया। इसके पीछे वजह यह थी कि संजय गांधी ने दिल्ली में ‘सुंदरीकरण’ अभियान चलाया। इस अभियान के तहत झुग्गी-झोपड़ियों और अनधिकृत बस्तियों को हटाया जाना था। इस अभियान से पहले संजय गांधी की ओर से बेहद आक्रामक परिवार नियोजन कार्यक्रम भी चलाया गया था।

अप्रैल, 1976 में दीवार वाले इस शहर में जहां मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के लोग रहते थे, वहां पर ‘सुंदरीकरण’ अभियान में कार्रवाई की गई। आपातकाल पर लिखे गए अपने संस्मरण में अर्थशास्त्री अशोक चक्रवर्ती लिखते हैं कि संजय गांधी 1976 की शुरुआत में तुर्कमान गेट आए थे और यहां जब उनका विरोध हुआ तो इससे वह नाराज हो गए थे।

चक्रवर्ती बताते हैं, ‘यह भी कहा जाता है कि संजय गांधी को तुर्कमान गेट के आसपास की इमारतें पसंद नहीं आई क्योंकि यहां से उन्हें जामा मस्जिद नहीं दिखाई देती थी।’

जानकारी के मुताबिक, इसके बाद तुर्कमान गेट के आसपास की झुग्गियों और ढांचों को तोड़ने का फैसला लिया गया।

13 अप्रैल, 1976 को तुर्कमान गेट के इलाके में पहली बार बुलडोजर आया। जब बाहरी इलाकों में झुग्गियों को बुलडोजर ने गिराया तब ज्यादा विरोध देखने को नहीं मिला लेकिन जब जामा मस्जिद के पास दुजाना हाउस में 2 किलोमीटर की दूरी पर एक परिवार नियोजन क्लीनिक खोला गया तब विरोध हुआ।

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रुखसाना सुल्ताना चला रही थीं क्लीनिक

परिवार नियोजन क्लीनिक को संजय गांधी की करीबी सामाजिक कार्यकर्ता रुखसाना सुल्ताना चला रही थीं। लोगों ने इस बात की गवाही दी कि पुरुषों और महिलाओं पर नकद और अन्य लालच के बदले नसबंदी करने का दबाव डाला गया था।

मानवविज्ञानी एम्मा टार्लो अपनी किताब Unsettling Memories: Narratives of the Emergency in Delhi (2003) में लिखती हैं, ‘इलाके के लोगों ने देखा कि कैसे सड़कों से भिखारियों को उठाया गया और उन्हें बेसमेंट के क्लीनिक में भेज दिया, जहां से कुछ कभी बाहर ही नहीं निकल पाए।’

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तुर्कमान गेट के इलाके में चला था बुलडोजर। (Express Archive – RK Sharma)

जब तुर्कमान गेट पर तोड़फोड़ जारी रही तो इससे वहां के लोगों में दहशत फैल गई, लोगों को इस बात का डर था कि उनके घरों पर भी कहीं तोड़फोड़ की कार्रवाई न हो। कुछ लोगों ने सुल्ताना से मदद मांगी।

एम्मा टार्लो लिखती हैं कि सुल्ताना ने तभी मदद करने की बात कही जब लोग इस इलाके में परिवार नियोजन का क्लीनिक खोलने और एक सप्ताह के भीतर नसबंदी के 300 मामले होने की शर्त पर तैयार हुए।

मोहल्ले में घुसे बुलडोजर

19 अप्रैल को जब बुलडोजर यहां के मोहल्ले में अंदर घुसे तो लोग अपने घरों से बाहर निकल आए। उन्होंने दुजाना हाउस में बनाए गए परिवार नियोजन केंद्र पर हमला कर दिया। पुलिस ने इसके विरोध में आंसू गैस और लाठी चार्ज किया। दिन भर झड़प होती रही। प्रदर्शनकारियों ने पत्थरबाजी की और इसके विरोध में पुलिस ने गोलीबारी की।

इस बीच, तोड़फोड़ का काम पूरा करने के लिए और बुलडोजर भेजे गए। चक्रवर्ती बताते हैं कि मलबे के साथ-साथ शवों को भी वहां से हटाया गया और इनमें कई घायल लोग भी शामिल थे और इन सभी को एक कूड़े वाली जगह पर फेंक दिया गया। तोड़फोड़ का यह काम 10 दिन तक चलता रहा।

चौबीसों घंटे चलते रहे बुलडोजर

पत्रकार जॉन दयाल और अजय बोस ने अपनी किताब For Reasons of State: Delhi under Emergency (2018) में लिखा है, ‘22 अप्रैल तक बुलडोजर चौबीसों घंटे तब तक चलते रहे, जब तक कि उन्होंने तुर्कमान गेट पर जीवन और मौत के सभी निशान मिटा नहीं दिए।’ जिंदा बचे लोगों के बयानों के अनुसार, इसमें लगभग 400 लोग मारे गए और 1,000 से ज्यादा घायल हो गए।

तुर्कमान गेट की घटनाओं की जांच शाह आयोग ने की लेकिन आयोग की रिपोर्ट के बावजूद किसी पर कोई मुकदमा नहीं चला और किसी बड़े अधिकारी को भी सजा नहीं हुई।

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