जब खेतों में हल चलाने वाले हाथ रस्सी थामकर देश का नाम रोशन करें, तो समझिए कि किस्मत भी मेहनत के आगे झुक जाती है। सुबह की पहली किरण जब खेतों पर पड़ती है, तब मिट्टी से उठती सौंधी खुशबू में पसीने की महक भी घुली होती है। यही पसीना किसी दिन खेल मैदान में ताकत बन जाता है और वही ताकत किसी परिवार की किस्मत बदल देती है।
कोल्हापुर के एक छोटे से गांव में जन्में अक्षय पाटिल की कहानी कुछ ऐसी ही है। जहां गरीबी, जिम्मेदारियां और हालात एक साथ खड़े थे, लेकिन उनके सामने खड़ा था एक मजबूत इरादा। जिस रस्साकशी को लोग आज भी गांव-मेले का मामूली खेल समझते हैं, उसी खेल ने अक्षय पाटिल को पहचान दी, रोजगार दिया और अपने परिवार को सम्मान की जिंदगी देने का अवसर दिया।
मिट्टी में पले, मेहनत में ढले
अक्षय पाटिल की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि उस भारत की तस्वीर है जहां खेल आज भी उम्मीद की सबसे मजबूत रस्सी है।अक्षय का बचपन खेतों की मेड़ों, बैलों की घंटियों और मिट्टी से सने पैरों के बीच बीता। पिता किसान थे और मां घर संभालने के साथ-साथ खेतों में हाथ बंटाती थीं। आमदनी सीमित थी और परिवार की जरूरतें ज्यादा। ऐसे माहौल में पढ़ाई करना भी एक चुनौती थी।
सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले अक्षय के लिए सालाना 1200 रुपये की फीस जुटाना भी कई बार मुश्किल होता था, लेकिन उसी स्कूल ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। पांचवीं कक्षा में जिलास्तरीय रस्साकशी ट्रायल हुआ। शिक्षक मजबूत कद-काठी वाले अक्षय पाटिल को उसमें ले गए। चयन हुआ और स्कूल ने फीस माफ कर दी। यही वह मोड़ था, जहां अक्षय को पहली बार अहसास हुआ कि खेल सिर्फ शौक नहीं, रास्ता भी हो सकता है।
गांव के अखाड़े से राष्ट्रीय मंच तक
गांव में रस्साकशी कोई नई चीज नहीं थी। मेलों में, त्योहारों में, प्रतियोगिताओं में यह खेल हमेशा लोगों का मनोरंजन करता रहा है, लेकिन अक्षय ने इसे मनोरंजन से आगे बढ़ाकर लक्ष्य बना लिया। सुबह खेतों में काम, दोपहर को स्कूल और शाम को अभ्यास, यही उनकी दिनचर्या बन गई।
बारिश हो या धूप, वह रोजना मैदान पहुंचते। पैरों में कई बार जूते नहीं होते थे, लेकिन हौसले की रफ्तार कभी धीमी नहीं पड़ी। धीरे-धीरे वह जिला टीम में पहुंचे, फिर राज्य स्तर पर चुने गए और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेलने लगे। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
पहली अंतरराष्ट्रीय पहचान
साल 2012 में चेन्नई में जूनियर रस्साकशी विश्व कप में अक्षय पाटिल ने भारतीय टीम के लिए रजत पदक जीता। यह सिर्फ एक पदक नहीं था, बल्कि उस किसान परिवार के लिए गर्व का क्षण था, जिसने कभी सपने देखने की हिम्मत भी मुश्किल से जुटाई थी। गांव लौटने पर लोगों ने ढोल-नगाड़ों के साथ उनका स्वागत किया। खेतों में काम करने वाले बेटे को देश का प्रतिनिधित्व करते देख माता-पिता की आंखों में गर्व के आंसू थे।
मेहनत का बड़ा इनाम: सरकारी नौकरी
लगातार मेहनत और पदकों का असर 2021 में दिखा, जब अक्षय को खेल कोटे से डाक विभाग में छंटाई सहायक (Sorting Assistant) की नौकरी मिली। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ था। पहली तैनाती घर से दूर हुई। हालांकि, कुछ समय बाद उन्हें कोल्हापुर ट्रांसफर मिल गया। अब वह सुबह दफ्तर जाते हैं। शाम को मैदान में खिलाड़ियों को अभ्यास कराते हैं। नौकरी सिर्फ आर्थिक सुरक्षा नहीं, बल्कि समाज में सम्मान भी लेकर आई।
बहन की शादी और माता-पिता का सहारा
नौकरी मिलने के बाद अक्षय पाटिल ने सबसे पहले परिवार की जिम्मेदारियों को संभाला। उन्होंने अगले ही साल इकलौती बहन की शादी की। इसके अलावा माता-पिता के लिए गाय-भैंस खरीदी और डेयरी व्यवसाय शुरू कराया, ताकि उन्हें अब खेतों में कड़ी मेहनत नहीं करनी पड़े। उनके लिए यह सिर्फ परिवार की मदद नहीं, बल्कि उस संघर्ष का सम्मान था, जो उनके माता-पिता ने जिंदगी भर किया।
कोच माधवी पाटिल का मार्गदर्शन
अक्षय पाटिल की इस यात्रा में कोच माधवी पाटिल की भूमिका अहम रही। कभी राष्ट्रीय वेटलिफ्टिंग कैंप का हिस्सा रह चुकीं माधवी ने रस्साकशी में अपना करियर बनाया और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचीं। आज वह शारीरिक शिक्षा शिक्षिका और कोच के रूप में युवाओं को तैयार कर रही हैं। वह मानती हैं कि अगर सरकार और समाज मिलकर इस खेल को आगे बढ़ाएं तो भारत विश्वस्तर पर भी बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकता है।
पदकों की चमक और अनुभव की ताकत
साल 2011 से 2022 के बीच अक्षय पाटिल ने सीनियर नेशनल प्रतियोगिताओं में दो स्वर्ण, चार रजत और तीन कांस्य पदक जीते। हालांकि, वह मानते हैं कि पदकों से ज्यादा जरूरी मैदान का अनुभव और अनुशासन है। इन्हीं चीजों ने उन्हें जीवन में स्थिरता दी।
खेलो इंडिया से मिली नई पहचान
खेलो इंडिया बीच गेम्स में रस्साकशी को लगातार दूसरी बार शामिल किया गया। इससे इस खेल को नई पहचान मिली। अक्षय 2026 में दीव में खेलो इंडिया बीच गेम्स में महाराष्ट्र टीम के सहायक कोच रहे। उनका मानना है कि ऐसे मंच ग्रामीण प्रतिभाओं को आगे लाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
भविष्य की पीढ़ी के लिए प्रेरणा
आज अक्षय खुद उन बच्चों को ट्रेनिंग देते हैं, जो कभी उनकी तरह नंगे पांव मैदान में उतरते हैं। वह चाहते हैं कि सिर्फ पैसों की वजह से किसी बच्चे का सपना नहीं टूटे। अक्षय कहते हैं, ‘अगर मुझे मौका मिला तो मैं हर गांव में ट्रेनिंग सेंटर खोलना चाहूंगा, ताकि बच्चों को बाहर जाने की जरूरत न पड़े।’
मामूली खेल, असाधारण कहानी
अक्षय पाटिल की कहानी बताती है कि खेल का मैदान सिर्फ जीत-हार का नहीं होता, बल्कि वह जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा भी होती है। यहां गिरकर उठना सिखाया जाता है, हारकर जीतना सिखाया जाता है और हालात से लड़ना सिखाया जाता है।
जिस रस्सी को लोग मामूली खेल का हिस्सा समझते हैं, उसी रस्सी ने अक्षय को गरीबी से निकालकर आत्मनिर्भरता की डोर थमा दी। यह कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की नहीं, बल्कि उस भारत की है, जहां खेतों से निकलकर खिलाड़ी देश का भविष्य गढ़ रहे हैं।
