SIR Controversy: पूरे देश में चुनाव आयोग द्वारा स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया चल रही है। दावा किया जा रहा है कि लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व चुनाव को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए यह प्रक्रिया बेहद जरूरी है।
लेकिन इस प्रक्रिया पर विपक्ष सवाल उठा रहा है और आम जनता भी कई दिक्कतों का सामना कर रही है। हालांकि, इन सबके बीच हम उन बीएलओ (BLO) को पूरी तरह नजरअंदाज कर रहे हैं, जो इस अभियान में सबसे सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ये बीएलओ घर-घर जाकर दस्तावेज इकट्ठा कर रहे हैं और मतदाता सूची को सही और अद्यतन बनाने में जुटे हैं। इन्हें लोकतंत्र के सच्चे सिपाही कहा जा सकता है।
प्रशासनिक मिसमैनेजमेंट, जिम्मेदार BLO कैसे?
लेकिन यही सिपाही इस समय परेशान हैं, दबाव में हैं, डर में जी रहे हैं और कई ने तो अपनी जान भी गंवा दी है। इसी डर और दबाव को समझने के लिए जनसत्ता ने कुछ बीएलओ से बात की है। ये सभी बीएलओ वर्तमान में किसी ना किसी स्कूल में शिक्षक, शिक्षा मित्र के रूप में कार्यरत हैं।
कई तो ऐसे हैं जो कई चुनाव देख चुके हैं, जिन्होंने हर बार बिना सवाल किए सरकार के आदेशों का हर बार पालन किया है, लेकिन इस बार जमीन पर मिसमैनेजमेंट ऐसी है कि ये शिक्षक भी त्रस्त हो चुके हैं।
एक तरफ SIR प्रक्रिया के दौरान कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है तो वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों द्वारा काम समय से एस.आई.आर की प्रक्रिया पूरी करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। एक बीएलओ ने दावा किया कि उन्हें टारगेट पूरा न करने पर एफआईआर किए जाने की धमकी दी गयी।
अगर कोई शख्स अपने जरूरी दस्तावेज नहीं जुटा पा रहा तो भी बीएलओ पर दोष मढ़ा जा रहा है, अगर कोई खुद अपने घर में किसी का वोटर लिस्ट में नाम नहीं जुड़वाना चाहता, फिर भी बीएलओ से सवाल पूछे जा रहे हैं। ये कोई एक राज्य की कहानी नहीं है, बात चाहे देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की हो, पश्चिम बंगाल की हो या फिर मध्य प्रदेश की। बस राज्य बदल रहे हैं, लेकिन इन बीएलओ की परेशानियां एक समान दिखाई देती हैं।
कहां-कहां हुई बीएलओ की मौत?
मध्य प्रदेश में दो बीएलओ की हार्ट अटैक से मौत हुई है, पश्चिम बंगाल में एक महिला बीएलओ ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया है। बंगाल के ही नादिया में एक बीएलओ का शव घर की छत से लटका मिला है। जयपुर में ट्रेन के आगे छलांग लगाकर एक बीएलओ ने अपनी जान गंवाई है। गुजरात में भी चार बीएलओ इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। अब इन मौतों पर सरकार के पास कोई सफाई नहीं है, आसानी से कहा जा रहा है कि पुरानी बीमारी की वजह से जान चली गई है, लेकिन इन्हीं मृतकों के परिवार वाले चीख-चीख कर बता रहे हैं कि SIR तनाव, अधिकारियों की धमकी की वजह से ये बीएलओ परेशान चल रहे थे।
‘सरकारी ऐप दे चुकी जवाब, कैसे भरें फॉर्म’
इस विवाद पर एक महिला बीएलओ कहती हैं-
‘मैं खुद SIR प्रक्रिया में शामिल हूं, कई लोगों के घर जा चुकी हूं। कई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जिन क्षेत्रों में मैं जा रही हूं, वहां कई लोगों ने अपने फॉर्म तक नहीं भरे हैं, ये सभी अपनी कोई भी जानकारी नहीं बताना चाहते। उन्हें समझाना पड़ रहा है कि आखिर क्यों सरकार ये सब कर रही है। इसके ऊपर जब हम ये सारा डेटा ऑनलाइन ऐप पर डालने जाते हैं तो वो काम नहीं करती। अब अगर ऐप काम नहीं कर रही तो इसमें हमारी क्या गलती है, लेकिन सवाल हमसे हो रहे हैं। डेडलाइन दे दी जाती है और बस किसी भी कीमत पर काम पूरा करना है।’
अधिकारियों के रवैये से नाराज एक दूसरी बीएलओ बताती हैं कि अभी हम कलेक्शन का काम कर रहे हैं, गांव-गांव जाकर डेटा इकट्ठा करना है, लेकिन लोग बिल्कुल भी सहयोग नहीं दे रहे। उनमें इस SIR को लेकर इतना कन्फ्यूजन है कि समझना मुश्किल हो रहा है, लेकिर फिर भी हम अपना शत प्रतिशत दे रहे हैं। हम तो सरकार को इस पहल में अपना पूरा समर्थन दे रहे हैं, लेकिन फिर भी अगर अधिकारी लोग ठीक तरीके से बात नहीं करेंगे, धमकी देंगे तो बुरा तो लगता है।
शादीशुदा महिलाओं को वोटर लिस्ट में शामिल करना मुश्किल
एक और बीएलओ से जब बात की तो पता चला कि इस SIR प्रक्रिया में महिलाओं को वोटर लिस्ट में शामिल करना एक अलग चुनौती साबित हो रहा है। उनके मुताबिक जो महिलाएं शादी कर अपने मायके से दूसरी जगह आई हैं, उनका डेटा कैसे वोटर लिस्ट में शामिल किया जाए, इसमें दिक्कत आ रही है। इस बारे में बीएलओ कहते हैं- मैंने देखा है कि जो औरतें शादी कर दूसरी नगर पंचायत आती हैं, SIR के दौरान उनका कॉलम भरा नहीं जा रहा। जो महिलाएं थोड़ी पढ़ी लिखी हैं या जिन्हें जानकारी हैं वो तो ऑनलाइन जाकर एक लिंक पर क्लिक करती हैं और सारा काम हो जाता है, लेकिन ये चीज सभी को नहीं पता।
‘खुद से कुछ नहीं करना चाहते मतदाता’
अब बीएलओ इस बात से तो परेशान है हीं कि SIR को लेकर जागरूकता की कमी है, उन्हें इस बात की ज्यादा दिक्कत है कि वोटर सामने से आकर मदद भी नहीं कर रहे। एक बीएलओ काफी तल्ख अंदाज में हमें कहते हैं-
‘मुझे कई मतदाताओं की नीयत पर भी शक होता है। मुझे ना कल 100 फॉर्म का टारगेट मिला था, अब हैरानी की बात ये है कि मुझे दोपहर के काम करते साढ़े तीन बज गए, लेकिन मैं मुश्किल से 50 फॉर्म भर पाया हूं। किसी ने भी अपना फॉर्म नहीं भरा था, कुछ लोगों ने जानकारी लिखी भी तो सारी गलत। ये हाल तब जब मैंने खुद पेंसिल से लिखकर कई लोगों को सारी डिटेल दी थीं।’
‘हिंदू वोटर बिल्कुल जागरूक नहीं है’
यहीं बीएलओ अपने अनुभव से एक पैटर्न की ओर भी ध्यान खींचते हैं। वे कहते हैं-
‘जिन क्षेत्रों का जिम्मा मुझे मिला है, वहां मैंने देखा है कि हिंदू मतदाता SIR प्रक्रिया में रुचि नहीं दिखा रहा, वो अपने वोट के लिए जागरूक दिखाई नहीं दे रहा है। वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम मतदाता सामने से आकर अपना और अपने परिवार का फॉर्म भरवा रहे हैं।’
अब यहां समस्याएं वोटर स्तर पर हैं, लेकिन सवाल फिर भी बीएलओ से पूछे जा रहे हैं। एक दूसरे अधिकारी से भी जब जनसत्ता ने बात की तो उसने बताया कि एसडीएम आकर धमकी दे जाता है, सिर्फ एक डेडलाइन होती है और उसमें काम करना होता है।
SDM दे रहे धमकी- फ्री की तनख्वाह खा रहे
वे कहते हैं कि कुछ दिन पहले ही हमारे एरिया में एसडीएम आया था, बस गुस्से में बोल दिया कि आप लोग इतना स्लो काम क्यों कर रहे हैं। अगर समय पर आप लोगों ने काम नहीं निपटाया तो आपके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। अब बीएलओ के मुताबिक डेडलाइन तो दी ही जा रही है, इसके अलावा अपमानजनक शब्द भी बोले जा रहे हैं। एक बीएलओ कहते हैं-
‘हमारे एरिया में कुछ दिन पहले एसडीएम आए थे, काफी भड़के हुए थे।हमारे साथी को उस एसडीएम ने कह दिया कि तुम फ्री की तनख्वाह ले रहे हो, काम नहीं करना तो घर पर बैठ जाओ।’
‘बार-बार चक्कर काटना पड़ रहा है’
एक और महिला बीएलओ से जब जनसत्ता ने बात की तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनके साथ किसी अधिकारी ने बदतमीजी नहीं की है, उन्हें कहीं से कोई धमकी नहीं मिली है। उनकी शिकायत इतनी है कि मतदाता अपने स्तर पर काफी ढिलाई बरत रहे हैं, वे इस SIR प्रक्रिया की अहमियत नहीं समझ रहे हैं। इस महिला बीएलओ की मानें तो बार-बार मतदाताओं के घर के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, काम को टाला जा रहा है।
वे इस बात पर भी जोर देती हैं कि बीएलओ की ड्यूटी में तनाव काफी ज्यादा है, ऊपर से प्रेशर रहता है कि इतने फॉर्म इतने समय में भरने होंगे। लेकिन किसी की जान से बढ़कर कुछ नहीं होता है। वैसे इस महिला बीएलओ ने भी सरकार की ऐप पर सवाल उठाए हैं, उन्होंने इस बात पर गुस्सा जाहिर किया है कि सर्वर डाउन रहता है, ऐप काम नहीं करती तो फॉर्म कैसे भरे जाएंगे। इस महिला बीएलओ ने यहां तक बताया है कि स्कूल में बच्चों की पढ़ाई काफी प्रभावित हो चुकी है, टीचर है नहीं पढ़ाने के लिए और ड्यूटी SIR में लग चुकी है।
चुनाव आते ही शिक्षक क्यों हैं पिसते?
अब जिन बीएलओ से जनसत्ता ने बात की, उनमें से कोई भी ये नहीं कह रहा कि वो SIR के खिलाफ या हैं या वो ड्यूटी नहीं करना चाहता। ये सभी बस प्रशासन से थोड़ा सहयोग चाहते हैं, सम्मान चाहते हैं। बस इतनी उम्मीद है कि उन्हें इस प्रकार से धमकियां ना मिलें, उनके दर्द को भी समझा जाए, परेशानियों को समझा जाए। जो उम्मीद आज ये बीएलओ लगा रहे हैं, 2021 में भी उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव के दौरान कई शिक्षकों ने लगाई थी। लेकिन हासिल क्या हुआ- कोरोना काल में 1600 से ज्यादा शिक्षकों की मौत हो गई, वहां भी योगी सरकार ने अपनी तरफ से कभी भी कोई आंकड़ा जारी नहीं किया, सिर्फ बाद में मुआवजे का ऐलान हुआ। अब इस बात को चार साल हो चुके हैं, लेकिन स्थिति में कितना सुधार हुआ? तब कोरोना कारण था आज SIR, क्या जान की कीमत चुकाकर ही लोकतंत्र की सेवा करना इकलौता मकसद रह गया है?
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