Devdutt Pattanaik on Arts & Culture: (द इंडियन एक्सप्रेस ने UPSC उम्मीदवारों के लिए इतिहास, राजनीति, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, कला, संस्कृति और विरासत, पर्यावरण, भूगोल, विज्ञान और टेक्नोलॉजी आदि जैसे मुद्दों और कॉन्सेप्ट्स पर अनुभवी लेखकों और स्कॉलर्स द्वारा लिखे गए लेखों की एक नई सीरीज शुरू की है। सब्जेक्ट एक्सपर्ट्स के साथ पढ़ें और विचार करें और बहुप्रतीक्षित UPSC CSE को पास करने के अपने चांस को बढ़ाएं। पौराणिक कथाओं और संस्कृति में विशेषज्ञता रखने वाले प्रसिद्ध लेखक देवदत्त पटनायक ने अपने इस लेख में बताया कि शिशपाल गढ़ के पुरातात्विक और सांस्कृतिक इतिहास पर चर्चा की है।)
पूर्वी भारत के ओडिशा के तट पर महानदी डेल्टा में स्थित शिशुपालगढ़ एक ऐसा शहर था जिसके बारे में आज के लोग बहुत ही कम जानते हैं। यह कृष्णा डेल्टा के प्रसिद्ध नागार्जुनकोंडा के उत्तर में स्थित है। इस ऐतिहासिक शहर में आज न तो कोई बौद्ध स्तूप बचे हैं, न जैन मंदिर और न ही हिंदू धर्म से संबंधित कोई भव्य स्मारक। संभवतः यही कारण है कि आज के वक्त में इतिहास की मुख्यधारा में इसे लगभग भुला दिया गया है।
आज के वक्त में ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के बाहरी इलाके में स्थित शिशुपालगढ़, आज से 2000 वर्ष पूर्व के एक समृद्ध शहरी जीवन की झलक पेश करता है। यह उस युग का प्रतीक है जब भारत वैश्विक समुद्री व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। उस समय नए साम्राज्य उदय हो रहे थे, व्यापारिक मार्ग दूर-दराज के देशों तक फैल रहे थे और नए धार्मिक विचार समाज को पुनर्गठित कर रहे थे। इसी माहौल में शिशुपालगढ़ प्राचीन कलिंग के एक महान केंद्र के रूप में उभरा है।
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साम्राज्यों के युग का उदय
पुरातात्विक साक्ष्यों के अध्ययन के मुताबिक, शिशुपालगढ़ की उत्पत्ति तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास हुई थी। यह वही समय था जब कलिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ और उन्होंने बौद्ध मूल्यों को अपनाया। इस दौरान पूर्वी तट पर बंदरगाहों, व्यापारिक संघों और मठों का विकास तेजी से हुआ। शिशुपालगढ़ का विशाल लेटराइट किला, जो चारों दिशाओं के साथ सटीक रूप से संरेखित (aligned) है, उस समय के भारतीय शहरीकरण के आत्मविश्वास और इंजीनियरिंग कौशल को दर्शाता है।
वैश्विक व्यापार का केंद्र
यह शहर ईसा पूर्व पहली शताब्दी से तीसरी शताब्दी ईस्वी के बीच अपने वैभव के शिखर पर था। यह वह समय था जब रोम का साम्राज्य भूमध्य सागर पर और हान वंश चीन पर शासन कर रहा था। ओडिशा का यह तट इन दोनों विश्वों को जोड़ने वाले समुद्री और थल मार्गों का हिस्सा था। यहाँ खुदाई में मिले रोमन शैली के मिट्टी के बर्तन और कीमती पत्थरों के मनके इस बात का प्रमाण हैं कि यहां के व्यापारियों का संबंध दक्कन से लेकर सुदूर रोम तक था।
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नियोजित शहर और ‘सोलह खंबा’
शिशुपालगढ़ केवल एक व्यापारिक केंद्र नहीं था, बल्कि एक सुव्यवस्थित नियोजित शहर था। यहाँ सड़कों, नालियों और भव्य प्रवेश द्वारों के साक्ष्य मिले हैं। शहर के केंद्र में नक्काशीदार पत्थर के स्तंभों का एक समूह है, जिसे स्थानीय लोग ‘सोलह खंबा’ कहते हैं। माना जाता है कि ये स्तंभ कभी एक विशाल सार्वजनिक हॉल का हिस्सा थे, जहाँ नागरिक सभाएँ या शाही समारोह होते थे। यह उस समय के संगठित नेतृत्व और एक विकसित समाज की ओर संकेत करता है।
धार्मिक बहुलता और सांस्कृतिक पहचान
शिशुपालगढ़ में धर्म की विविधता प्राचीन भारतीय समाज की उदारता को दर्शाती है। यहाँ मिली मिट्टी की मूर्तियों में लोक देवियों, दुर्गा के प्रारंभिक रूपों और यक्ष पूजा के प्रमाण मिलते हैं। हालाँकि किले के भीतर कोई बड़ा बौद्ध मठ नहीं मिला, लेकिन यह स्पष्ट है कि यहाँ के लोग धौली और जौगड़ा जैसे निकटवर्ती बौद्ध केंद्रों के सांस्कृतिक प्रभाव में थे। यहाँ शैव और वैष्णव धर्म के प्रारंभिक चिन्ह भी दिखाई देते हैं, जो एक ऐसे समाज की तस्वीर पेश करते हैं जहां लोग विभिन्न मान्यताओं के बीच बिना किसी विभाजन के रहते थे।
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इतिहास और लोक स्मृति
रोचक बात यह है कि ‘शिशुपालगढ़’ नाम प्राचीन नहीं है। शिलालेखों में इस शहर के मूल नाम का उल्लेख नहीं मिलता। मध्यकाल के दौरान जब यहाँ ग्रामीण बसे, तो उन्होंने इस विशाल किले के खंडहरों को महाभारत के पात्र राजा शिशुपाल से जोड़ दिया। भारतीय संस्कृति में यह सामान्य है कि पुराने परित्यक्त किलों को महाकाव्य के नायकों से जोड़कर याद रखा जाता है। विद्वानों का मानना है कि प्राचीन शिलालेखों में वर्णित ‘कलिंगनगर’ ही शायद यह शहर था, लेकिन पुख्ता प्रमाणों के अभाव में ‘शिशुपालगढ़’ नाम ही प्रचलित रहा।
पतन और विरासत
चौथी शताब्दी ईस्वी तक आते-आते इस शहर का पतन होने लगा। नदियों के मार्ग बदलने और व्यापारिक मार्गों में बदलाव के कारण यहां का वैभव कम होता गया। धीरे-धीरे खंडहरों पर गाँव बस गए और इतिहास कहानियों में बदल गया। आज शिशुपालगढ़ भारत के सबसे पुराने नियोजित शहरों में से एक है। यह हमें याद दिलाता है कि ओडिशा कभी वैश्विक व्यापार और संस्कृति का एक समृद्ध केंद्र था, जो गंगा के मैदानों से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया और रोम तक जुड़ा हुआ था। भारत में क्या है लोहे का इतिहास, समझिए कैसे हुआ धातुओं का विस्तार…
