देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की मीठी नदी साल 2005 में तब चर्चा में आई जब इसमें आई बाढ़ में एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गयी। पिछले दो दशकों में तमाम चेतावनियों और 1297 करोड़ खर्च करने के बावजूद इस नदी के हालात सुधरे नहीं हैं। जनसत्ता के सहयोगी इंडियन एक्सप्रेस ने जब पड़ताल की तो पता चला आज भी मीठी नदी प्रदूषित है। इसमें गंदगी चरम पर है।
सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार मीठी नदी के पानी की गुणवक्ता समय के साथ पहले से खराब हुई है। सीवेज के पानी और दूसरे प्रदूषण की वजह से हालात ज्यादा बिगड़े हैं। इतना ही नहीं, नदी को साफ करने के लिए 6300 करोड़ की परियोजनाएं समय से पीछे चल रही हैं जिनके जरिए मीठी नदी की तकदीर बदलनी थी। अब जब 15 जनवरी को बीएमसी चुनाव होने हैं, जिसका बजट 75000 करोड़ से ज्यादा है, एक बार फिर यह मीठी नदी चर्चा में है। मीठी नदी की दुर्दशा दिखाती है कि सरकारें बदल गईं, लेकिन इस नदी को लेकर कोई जवाबदेही तय नहीं हो पाई।
विशेषज्ञों के मुताबिक पिछले कुछ सालों में नदी की होल्डिंग कैपेसिटी जरूर बढ़ा दी गई है, लेकिन दूषित पानी की समस्या से पार नहीं पाया गया है। अगर 12 महीनों का वॉटर क्वालिटी इंडेक्स देखा जाए तो पता चलता है कि स्थिति में सुधार नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस ने 2008 से लेकर 2025 तक महाराष्ट्र पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के डेटा को समझा है, जो बातें सामने आईं और गौर करने लायक हैं।
डेटा से निकली पहली बात: मीठी नदी की गुणवक्ता 65 महीनों तक खराब से बेहद खराब श्रेणी में रही। 16 महीनों तक खराब श्रेणी में।
डेटा से निकली दूसरी बात: WQI मई 2008 में बाढ़ के तीन साल बाद 41.03 इकाई था, जो घटकर मई 2024 में 27.60 रह गया।
डेटा से निकली तीसरी बात: 2009 से मई 2025 के बीच मीठी नदी में बीओडी का औसत स्तर ज्यादा, अधिकतम 108 मिलीग्राम प्रति लीटर
डेटा से निकली चौथी बात: फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 2009 से 2024 के बीच 2.5 गुना बढ़ गया
आंकड़े तो यह भी बताते हैं कि बीएमसी ने 2007 से 2020 के बीच मीठी नदी में रेटेनिंग वॉल, ड्रेनेज लाइन बनाने के लिए 881.14 करोड़ रुपये खर्च किए, इसके ऊपर डिसिल्टिंग पर भी 2007 से 2025 के बीच 415.68 करोड़ अतिरिक्त खर्च किए। लेकिन फिर भी इस नदी में अनट्रीटेट सीवेज का वेस्ट भारी मात्रा में जा रहा है, इस चुनौती का समाधान नहीं निकल पा रहा है। इसके ऊपर इस नदी की तकदीर बदलने के लिए जिन चार प्रोजेक्ट्स पर काम होना था, अब तक सिर्फ एक ही पूरा हो पाया है। वहां भी जो 1700 करोड़ का सबसे जरूरी प्रोजेक्ट था उसका टेंडर तो पिछले साल नवंबर में ही पारित हुआ है, वहां भी आठ साल की देरी हो चुकी है।
पड़ताल में यह भी पता चला है कि नदी की गुणवत्ता और प्रदूषण नियंत्रण परियोजना के लिए नगर निगम द्वारा आवंटित 3,941 करोड़ रुपये अब तक खर्च नहीं किए गए हैं। इसी चुनौती का एक पहलू यह है कि कई ऐसी परियोजनाएं सामने हैं जिन पर खर्च तो काफी हुआ, लेकिन जमीन पर काम शुरू होता नहीं दिखा। उदाहरण के लिए पैकेज 2 के तहत 2007 से 2017 के बीच अधूरे पड़े काम रिटेनिंग वॉल बनाना और 10 किलोमीटर का सीवेज नेटवर्क तैयार करना था। काम तो 2021 में शुरू हो गया, लेकिन इसकी डेडलाइन 2023 से बढ़कर अब 2027 हो चुकी है।
इसी तरह पैकेज 3 के तहत 18 आउटफॉल्स पर गेट पंप लगाना और 5.9 किलोमीटर में सीवेज नेटवर्क जोड़ना था। लेकिन यह काम अभी रुक चुका है। बड़ी बात यह है कि इस परियोजना के लिए दिसंबर 2025 में ही लेटर ऑफ अप्रूवल जारी हुआ, वह भी अदाणी ट्रांसपोर्ट के नेतृत्व वाली एसपीवी (Special Purpose Vehicle) को। वहीं चौथे पैकेज के तहत 6.8 किलोमीटर लंबी टनल बननी थी जिससे सीवर के पानी को रोककर दूसरी दिशा में मोड़ा जा सके। इससे 168 एमएलडी सीवेज को रोका जाना था। अब काम जनवरी 2021 में शुरू हुआ था, पहले सितंबर 2025 तक पूरा होना था, लेकिन अब इसकी नई डेडलाइन दिसंबर 2026 तय की गई है।
अब गोपनीयता की शर्त पर इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए एक बीएमसी अधिकारी कहते हैं कि मीठी नदी में वर्तमान में भी 309 एमएलडी का अनट्रीटेट सीवेज जाता है। लेकिन इस समय सारा ध्यान सिर्फ बाढ़ रोकने पर किया जा रहा है।
अब जानकारी के लिए बता दें कि जुलाई 2005 की बाढ़ के करीब एक महीने बाद ही महाराष्ट्र सरकार ने मीठी नदी विकास और संरक्षण प्राधिकरण बनाया। इसका मकसद एमएमआरडीए और बीएमसी के बीच तालमेल बैठाकर नदी की मरम्मत और बाढ़ से बचाव के काम करना था। इसके अलावा माधवराव चितले की अध्यक्षता में 8 सदस्यीय जांच समिति भी बनाई गई, ताकि यह पता लगाया जा सके कि बाढ़ क्यों आई और आगे क्या सुधार किए जाएं।
2006 में आई समिति की रिपोर्ट में बताया गया कि बाढ़ के पीछे कई बड़ी वजहें थीं, जिनमें उद्योगों से निकलने वाला गंदा पानी, नदी किनारे किया गया अतिक्रमण, सीवेज और ठोस कचरा प्रबंधन की खराब व्यवस्था, और नदी की जल वहन क्षमता का लगातार कम हो जाना प्रमुख रूप से शामिल थे। अब एक तरफ प्रदूषित नदी से प्रशासन त्रस्त है तो वहीं आम लोगों के जीवन पर भी इसका असर साफ पड़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कुर्ला, धारावी और साकी नाका जैसे इलाकों में नदी किनारे रहने वाले लोगों के लिए फीकल प्रदूषण का ऊंचा स्तर गंभीर खतरा पैदा करता है। इससे खासकर बच्चों और बुज़ुर्गों में बुखार, दस्त और त्वचा संक्रमण जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है।
