ईरान में पिछले दो हफ्तों से व्यापक प्रदर्शन हो रहा है। ये प्रदर्शन ईरान में बढ़ती महगांई के कारण हो रहा है। लोग सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामनेई के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। तेहरान समेत मशहद और इस्फहान जैसे प्रमुख शहरों में लोग सड़कों पर हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले माह तेहरान के ग्रैंड बाजार से यह प्रदर्शन व्यापारियों ने शुरू किया था जो अब बड़ा रूप ले चुका है। व्यापारियों ने ईरानी मुद्रा में तेज गिरावट और बढ़ती महंगाई के खिलाफ आवाज उठाई थी। एक अमेरिकी रिपोर्ट्स के मुताबिक अब तक इस प्रदर्शन में 42 लोगों की जान जा चुकी है और 2270 लोगों को हिरासत में लिया गया है।
बता दें कि ईरान में हो रहे प्रदर्शन की तुलना साल 1979 के दौरान हुई इस्लामिक क्रांति से जोड़ा जा रहा, तब जनता के गुस्से के आगे ईरान के तत्कालीन शासक को झुकना पड़ा था और अपना देश छोड़कर जाना पड़ गया था।
1979 में कौन था शासक?
1979 में ईरान में पहलवी वंश के राजा का शासन था। ईरान में पहलवी वंश के शासन की नींव 1926 में रजा पहलवी ने रखी थी। रजा शाह ईरान के शासक थे। रजा शाह का शासक बनने से पहले नाम रजा खान था। रजा शाह जर्मन के सहयोगी माने जाते थे, जिस कारण द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अगस्त 1941 के दौरान सोवियत सेना को ईरान के रास्ते युद्ध सामग्री की आपूर्ति करने के लिए मित्र देशों ने अगस्त 1941 में संयुक्त रूप से ईरान पर कब्जा कर लिया। इसके बाद रजा शाह ने अपने बेटे को सत्ता सौंप दिया और फिर मोहम्मद रजा पहलवी ईरान के शासक बने, जो 1941 से 1979 तक ईरान के शासक रहे।
क्यों हुआ शासक का विरोध?
मोहम्मद रजा पहलवी आधुनिक सोच के थे, इसलिए उन्होंने शासक बनते ही ईरान में अमेरिका की मदद से राष्ट्रीय विकास कार्यक्रम को खूब आगे बढ़ाया। उन्होंने इसे श्वेत क्रांति नाम दिया, श्वेत क्रांति के दौरान ईरान में सड़क, रेल और हवाई नेटवर्क का विस्तार, कई बांध और सिंचाई परियोजनाएं, मलेरिया जैसी बीमारियों का उन्मूलन, औद्योगिक विकास खूब हुआ। साथ ही महिलाओं को भी शाह ने खुले तौर पर जीने की आजादी दी। इस्लामिक मौलानाओं को उनके इस सोच से परेशानी होने लगी और उन्होंने मोहम्मद रजा पर भ्रष्टाचार, तेल संपदा के असमान वितरण, जबरन पश्चिमीकरण के आरोप लगाने लगे। मोहम्मद रजा शाह पश्चिमी देशों की तरह ईरान को आधुनिक बनाना चाहते थे और लेकिन वहां के मौलाना इससे और चिढ़ गए और उन्हें अमेरिका का पिट्ठू कहने लगे।
कैसे हुआ 1979 का जन विद्रोह?
वैसे तो इस्लामिक क्रांति का आरंभ तो 1978 माना जाता है लेकिन इसकी चिंगारी साल 1963 में जल उठी थी, तब ईरान के शासक मोहम्मद रजा शाह ने श्वेत क्रांति का ऐलान किया। खुमैनी ने इसका खुले तौर पर विरोध किया। साल 1964 में रजा शाह ने आयोतल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी को गिरफ्तार किया और ईरान से निर्वासित कर दिया। मोहम्मद रजा शाह के सुधारों के विरोध की वजह से उन्हें 15 साल ईरान से बाहर इराक और फ्रांस में रहे। इस बीच खुमैनी पत्रों के माध्यम से लोगों को संबोधित करते रहे।
साल 1971 में शाह ने प्राचीन ईरान के हख़ामनी शासकों द्वारा स्थापित विश्व के उस समय के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना के 2500 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया। इस आयोजन में दुनियाभर के राष्ट्राध्यक्षों और उनके प्रतिनिधियों को बुलाया गया। इस आयोजन में पैसा पानी की बहाया गया। इस दौरान ईरान के ग्रामीणों का जीवन दयनीय स्थिति में पहुंच गया था।
फिर आया साल 1973 जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की दामों में गिरावट आई, इसने ईरान की अर्थव्यवस्था के हालत को हिलाकर रख दिया लेकिन रजा पहलवी अपने श्वेत क्रांति को सफल बनाने में लगे रहे।
आयोतल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने मोहम्मद रजा शाह के कामों को इस्लाम के हिसाब से गलत बताया। लोग धीरे-धीरे खुमैनी से जुड़ने लगे। इस दौरान ईरान के मौलवी खुलकर शाह का विरोध करने लगे।
साल 1978 के सितंबर में जनता की नाराजगी बढ़ गई। लोगों को शांत करने के लिए ईरान में मार्शल लॉ लगा दिया गया। सुरक्षाबल और आम लोगों के बीच झड़पें हुई। 1979 आते-आते ईरान में गृहयुद्ध के हालात बन गए। लोग खुमैनी का वापसी की मांग करने लगे और ईरानी सेना उनपर गोलियां चलाने लगी।
ईरान के तत्कालीन शासक ने छोड़ा अमेरिका
हालात दिन-ब-दिन बेकाबू हो गए और शापोर बख्तियार की मांग पर 16 जनवरी 1979 को ईरान के तत्कालीन शासक रजा शाह पहलवी अपने परिवार के साथ ईरान छोड़ अमेरिका चले गए। जाते समय शाह ने शापोर बख्तियार को अपना अंतरिम प्रधानमंत्री बना दिया। हालांकि शाह ने पदत्याग नहीं किया। शापोर बख्तियार ने सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा किया और खुमैनी को ईरान आने दिया।
प्रधानमंत्री शापोर बख्तियार उस समय देश में चुनाव कराने के पक्ष थे लेकिन खुमैनी ने उनकी एक न सुनी और अप्रैल 1979 में जनमत संग्रह के बाद इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान का ऐलान किया गया। इसके बाद अयोतुल्लाह खुमैनी को ईरान का सुप्रीम लीडर घोषित कर दिया गया वह मृत्युपर्यंत इस पद पर बने रहे।
अयातुल्ला अली खामनेई कैसे बने सुप्रीम लीडर?
अपनी मृत्यु से पहले तत्कालीन सुप्रीम लीडर अयोतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने अयातुल्ला अली खामनेई को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। इसके बाद 1989 में अयातुल्ला अली खामनेई ईरान के दूसरे सुप्रीम लीडर बन गए।
कौन है रजा पहलवी?
ईरान से निर्वासित मोहम्मद रजा पहलवी की तीसरी पत्नी फराह दीबा ने अक्टूबर 1960 में एक बेटे रजा पहलवी को जन्म दिया। रजा पहलवी के ही आह्वान पर 8 जनवरी की रात 8 बजे बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे।
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