हमारी आंखें कुदरत का अनोमल तोहफा हैं। इन्हीं की बदौलत हम अपनी दिनचर्या से जुड़े सभी छोटे-बड़े काम जैसे कि पढ़ाई-लिखाई, गाड़ी चलाना या फिर पहाड़ की चढ़ाई हो या दरिया पार जाना, सब बड़ी आसानी से कर लेते हैं। हालांकि सभी के लिए ऐसा करना आसान नहीं होता है। कारण कि कई लोगों को अपनी आंखों से सामान्य रूप से देखने के लिए भी काफी मशक्कत करनी पड़ती है।
दुनियाभर में 285 मिलियन से ज्यादा लोगों की आंखें कमजोर हैं। फ्रेड होलोज फाउंडेशन के मुताबिक, दुनियाभर में लगभग 32.4 मिलियन लोग दृष्टिहीन हैं। इनमें 90 फीसद लोग विकासशील देश से हैं और इनमें आधे से ज्यादा लोगों ने आंखों की रोशनी मोतियाबिंद के कारण गंवा दी है। मोतियाबिंद आंखों में होने वाली एक सामान्य बीमारी है, यह दुनिया भर में अंधेपन का प्रमुख कारण है। मोतियाबिंद का इलाज संभव है। इसका एक मात्र विकल्प लेजर विजिन करेक्शन (लेसिक) सर्जरी है जो काफी महंगी है। ऐसे में इलाज का यह तरीका विकासशील देशों के उन लोगों की पहुंच से बाहर है जिन्हें बुनियादी चिकित्सा देखभाल भी नहीं मिलती।
अमेरिकन एकेडमिक आॅफ आॅप्थाल्मोलॉजी के मुताबिक लगभग 22 मिलियन अमेरिकी जो 40 वर्ष से अधिक आयु के हैं उन्हें मोतियाबिंद होता है। जब तक वे 80 साल की उम्र तक पहुंचते हंै, आधे से अधिक अमेरिकियों को मोतियाबिंद हो चुका होता है, जिनमें से कई को दर्दनाक और महंगी सर्जरी से गुजरना होता या कई को जीवन भर दृष्टि संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वैज्ञानिकों ने मोतियाबिंद के उपचार का एक नया विकल्प खोजा है। अमेरिका में स्थित शोधकर्ताओं ने एक ऐसी दवा बनाई है, जिसे एक आई ड्रॉपर के जरिए सीधे आंखों में पहुंचाया जा सकता है जो मोतियाबिंद को खत्म कर सकता है।
हालांकि अभी इस आई ड्रॉप का मनुष्यों पर परीक्षण नहीं किया गया है। अभी इसके क्लीनिकल ट्रायल की तैयारी चल रही है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इसके कोई दुष्प्रभाव तो नहीं है। अगर परीक्षण सफल रहता है तो जल्द ही यह आई ड्रॉप बाजार में उपलब्ध होगा, जिसे मोतियाबिंद की सर्जरी की जगह इस्तेमाल किया जा सकेगा। ऐसे करेगा काम मोतियाबिंद क्रिस्टलीय प्रोटीन की संरचना के परिणामस्वरूप होता है जो हमारी आंखों में लेंस बनाते हैं। विशेष रूप से, वे तब बनते हैं जब यह संरचना बिगड़ती है, जिसके कारण प्रोटीन आपस में जुड़ जाते हैं जिससे आंखों पर एक दूधिया परत बन जाती है जो दृष्टि को बाधित करती है।
यह उपचार प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले स्टेरॉइड के आधार पर बनाया गया है, जिसे ‘लैंस्टोरोल’ के रूप में जाना जाता है। इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने दो ऐसे भाई-बहनों को लिया जो मोतियाबिंद से ग्रसित थे। हालांकि उनके माता-पिता को मोतियाबिंद नहीं था। इन भाई-बहनों ने एक उत्परिवर्तन साझा किया था जिसने लैंस्टोरॉल का उत्पादन बंद कर दिया। उनके माता-पिता के पास यह उत्परिवर्तन नहीं था। वैज्ञानिकों के अनुसार माता-पिता ‘लैंस्टोरोल’ का उत्पादन कर रहे हैं जिसके कारण उन्हें मोतियाबिंद नहीं हुआ। वहीं उनके बच्चों को मोतियाबिंद है क्योंकि वे ‘लैंस्टोरोल’ का उत्पादन नहीं कर रहे हैं। इससे वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आंख में ‘लैंस्टोरोल’ क्रिस्टलीय प्रोटीन को आपस में जुड़ने और मोतियाबिंद बनाने से रोक सकता है। वैज्ञानिकों ने इस परिकल्पना का परीक्षण खरगोशों पर किया था और इसके परिणाम बहुत आशाजनक थे। शोध पेपर का सह-लेखन करने वाले रुबेन अबाग्यान को उम्मीद है कि ‘लैंस्टोरोल’ की बूंदों का मनुष्यों में मोतियाबिंद पर समान प्रभाव पड़ेगा। यदि मनुष्यों पर इस आई ड्रॉप का परीक्षण सफल होता है और यह दवा बाजार में आती है तो दुनिया भर में लाखों लोगों का जीवन बदल सकता है।
