डर मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति का हिस्सा है, लेकिन यह डर तब सामान्य नहीं रह जाता जब यह एक बीमारी बन जाए। डर एक इमोशनल प्रतिक्रिया है, जो किसी से डांट पड़ने की वजह से, किसी से धमकी मिलने की वजह से, किसी भयानक चीज को देख लेने की वजह से होती है। यही डर जब एक ऐसे खतरनाक लेबल पर पहुंच जाता है जहां इंसान किसी चीज से इतना डरने लगे कि उस डर को खत्म करने के लिए वह अपनी जान तक से खेल जाए तो उस डर को मेडिकल साइंस में फोबिया कहा जाता है। फोबिया किसी भी चीज से डर को लेकर हो सकता है। मनोवैज्ञानिकों ने 400 तरह के फोबिया के बारे में बताया है। ये कभी-कभी जानलेवा भी हो जाते हैं।
फोबिया भी कई तरह के होते हैं। एक वो जो बचपन में किसी डर के मन में बैठ जाने के कारण होते हैं। इन्हें चाइल्डहुड फोबिया कहते हैं। जो डर वयस्क होने के बाद फोबिया बन जाए उसे एडल्टहुडफोबिया कहते हैं। फोबिया का मरीज यूं तो आम लोगों की ही तरह दिखाई देता है लेकिन अपना डर सामने आने के बाद उसे फोबिया का दौरा पड़ने लगता है। ऐसे में उसमें तनाव, पसीने आना, बेचैनी, सांस तेज होना, चक्कर आना, पेट खराब हो जाना, ब्लड प्रेशर बढ़ जाना आदि लक्षण दिखने लगते हैं। फोबिया से ग्रसित अलग-अलग तरह के रोगी होते हैं। जैसे जिन्हें अंजान व्यक्ति या समूह के सामने आने से, उनसे बात करने से डर लगता है वो सोशलोफोबिया से ग्रस्त होते हैं।
जिन्हें स्कूल जाने से डर लगता है वो डिडास्केलेनोफोबिया से ग्रस्त होते हैं। इसी तरह जिन्हें बारिश से डर लगता है उन्हें ओम्ब्रोफोबिया, जिन्हें भीड़भाड़ वाले स्थानों से डर लगता है उन्हें एगोराफोबिया, जिन्हें ऊंचाई से डर लगता है उन्हें एक्रोफोबिया की समस्या होती है। कुत्तों से डरने वाले सियानोफोबिया, इंजेक्शन से डरने वाले ट्राइपानोफोबिया और अंधेरे से डरने वाले नीक्टोफोबिया से ग्रस्त होते हैं। फोबिया के ईलाज के लिए कोई खास ट्रीटमेंट नहीं होता है। हर मरीज का इलाज उसके डर के हिसाब से किया जाता है। इसलके ईलाज के लिए दवाएं, काउंसिलिंग और मनोवैज्ञानिक थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है।