स्वास्थ्य से जुड़े मसलों की विश्वप्रसिद्ध पत्रिका लांसेट ने दुनिया भर की सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का आकलन पेश किया है, जिसमें दुनिया के एक सौ पंचानबे देशों की सूची में भारत को एक सौ पैंतालीसवें स्थान पर रखा गया है। इससे एक बार फिर भारत की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। माकूल चिकित्सा सुविधाएं न मिल पाने की वजह से बहुत सारे लोग असमय मौत के मुंह में चले जाते हैं। जबकि जिन बीमारियों से वे पीड़ित थे, उनका आसानी से इलाज संभव है। भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है, मगर सरकारें इस मसले पर गंभीर नजर नहीं आतीं। इस बार की चर्चा इसी पर। – संपादक

देवेंद्रराज सुथार

बीमारी से निजात पाने अस्पताल जा रहे मरीजों की जान कब लापरवाही लील ले, किसी को पता नहीं। देश के अस्पतालों में एक के बाद एक किस्से सामने आ रहे हैं, मगर हर कोई बदइंतजामी के सामने बौना नजर आ रहा है। अब कानपुर के बड़े अस्पताल में एसी खराब होने से पांच मरीजों की मौत हो गई। ये सभी आईसीयू में भर्ती थे। जब आईसीयू की यह हालत है, तो दूसरे वार्डों में बदइंतजामी और लापरवाही का अंदाजा लगाया जा सकता है। पिछले साल गोरखपुर में अस्पताल की लापरवाही के चलते कई बच्चों ने अपनी जान गंवा दी थी, लेकिन सरकारों ने इससे कोई सबक नहीं लिया।

सरकारी अस्पतालों में ऐसी आपराधिक लापरवाही क्या इसलिए बरती जाती है कि वहां इलाज के लिए जाने वाले अधिकतर लोग गरीब तबके के होते और अपने साथ होने वाली नाइंसाफी को चुपचाप सह लेते हैं? दरअसल, किसी भी देश में स्वास्थ्य जनता का सबसे पहला बुनियादी अधिकार होता है। पर इसके विपरीत भारत में बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में रोजाना हजारों लोग अपनी जान गंवा देते हैं। भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बांग्लादेश, चीन, भूटान और श्रीलंका समेत अपने कई पड़ोसी देशों से पीछे है। इसका खुलासा स्वास्थ्य शोध पत्रिका ‘लांसेट’ ने अपने ‘ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज’ नामक अध्ययन में किया है। इसके अनुसार, भारत स्वास्थ्य देखभाल, गुणवत्ता और पहुंच के मामले में एक सौ पंचानबे देशों की सूची में एक सौ पैंतालीसवें स्थान पर है।

हमारे देश में सरकारी अस्पतालों का बुरा हाल है। ऐसे में निजी अस्पताल सर्वत्र देखने को मिल रहे हैं। मगर इन अस्पतालों में इलाज कराना इतना महंगा है कि मरीज को अपना घर, जमीन और खेत गिरवी रखने के बाद भी बैंक से कर्ज लेना पड़ता है। विचारणीय है कि क्या भारत में विकास का पैमाना यह है कि एक गरीब को अपने किसी परिजन का इलाज करवाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाना पड़े। अपना सब कुछ गंवाने के बाद भी उसके प्राण न बच सके। ऐसे में उन लोगों पर क्या गुजरती होगी! हमारे देश में स्वास्थ्य सेवाओं की ऐसी लचर स्थिति है कि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी और सुविधाओं का अभाव होने के कारण मरीजों को अंतिम विकल्प के तौर पर निजी अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है। देश में स्वास्थ्य जैसी अतिमहत्त्वपूर्ण सेवाएं बिना किसी दृष्टि और नीति के चल रही हैं। ऐसे हालात में गरीब के लिए इलाज कराना क्षमता से बाहर होता जा रहा है।

गौरतलब है कि हम स्वास्थ्य सेवाओं पर सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का सबसे कम खर्च करने वाले देशों में शुमार हैं। आंकड़ों के मुताबिक, भारत स्वास्थ्य सेवाओं में जीडीपी का महज 1.3 प्रतिशत खर्च करता है, जबकि ब्राजील स्वास्थ्य सेवा पर लगभग 8.3 प्रतिशत, रूस 7.1 प्रतिशत और दक्षिण अफ्रीका लगभग 8.8 प्रतिशत खर्च करता है। दक्षेस देशों में, अफगानिस्तान 8.2 प्रतिशत, मालदीव 13.7 प्रतिशत और नेपाल 5.8 प्रतिशत खर्च करता है। भारत स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने पड़ोसी देशों चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी कम खर्च करता है। 2015-16 और 2016-17 में स्वास्थ्य बजट में तेरह प्रतिशत की वृद्धि की गई थी, लेकिन मंत्रालय से जारी बजट में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के हिस्से में गिरावट आई और यह मात्र 4.8 प्रतिशत रहा। परिवार नियोजन में 2013-14 और 2016-17 में स्वास्थ्य मंत्रालय के कुल बजट का दो प्रतिशत रहा। इसी वजह से जननी सुरक्षा और राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाएं भी पर्याप्त आबंटन न मिलने का दंश झेलती रहती हैं। फिर, भ्रष्टाचार और बदइंतजामी की मार ऊपर से।

देश में चौदह लाख डॉक्टरों की कमी है। ओड़ीशा, छत्तीसगढ़, राजस्थान के ग्रामीण अस्पतालों में नब्बे फीसद विशेषज्ञों की कमी है। उत्तराखंड में पचासी फीसद की कमी है। बिहार और झारखंड में दस हजार की आबादी पर 0.5 फिजिशियन हैं। 2011 की जनसंख्या के हिसाब से भारत की ग्रामीण आबादी तिरासी करोड़ से अधिक थी। इन लोगों के लिए मात्र 45,062 डॉक्टर हैं। 2007 में इस आबादी के लिए 27,725 डॉक्टर थे। 2007 में अमेरिका की आबादी थी तीस करोड़, जबकि वहां भारत से पचास हजार डॉक्टर जाकर काम कर रहे थे। आज भी यही अनुपात है। भारत से ही सबसे अधिक डॉक्टर अमेरिका जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के आधार पर जहां प्रति एक हजार आबादी पर एक डॉक्टर होना चाहिए, पर भारत में सात हजार की आबादी पर एक डॉक्टर है। ग्रामीण इलाकों में चिकित्सकों के काम नहीं करने की अलग समस्या है।

यह भी सच है कि भारत में बड़ी तेजी से स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण हुआ है। आजादी के समय देश में निजी अस्पतालों की संख्या आठ प्रतिशत थी, जो अब बढ़ कर तिरानबे प्रतिशत हो गई है। वहीं स्वास्थ्य सेवाओं में निजी निवेश पचहत्तर प्रतिशत तक बढ़ गया है। इन निजी अस्पतालों का लक्ष्य मुनाफा बटोरना रह गया है। दवा निर्माता कंपनियों के साथ सांठ-गांठ करके महंगी से महंगी दवा देकर मरीजों से पैसे ऐंठना अब इनके लिए रोज का काम बन चुका है। यह समझ से परे है कि भारत में, जहां आज भी बहुत सारे लोग आर्थिक पिछड़ापन का शिकार हैं, वहां स्वास्थ्य जैसी सेवाओं को निजी हाथों में सौंपना कितना उचित है?

एक अध्ययन के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं के महंगे खर्च के कारण भारत में प्रतिवर्ष चार करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। रिसर्च एजेंसी ‘अर्न्स्ट ऐंड यंग’ द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में अस्सी फीसद शहरी और करीब नब्बे फीसद ग्रामीण नागरिक अपने सालाना घरेलू खर्च का आधे से अधिक हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च कर देते हैं। इन हालात में भारत में सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करने के लिए स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन की जरूरत है। भारत को स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सेवाओं के लिए सकल घरेलू उत्पाद की दर में बढ़ोतरी करनी होगी। सरकार को निश्शुल्क दवाइयों के नाम पर केवल खानापूर्ति करने से बाज आना होगा। यह ध्यान रखना होगा कि एंबुलेंस के अभाव में किसी मरीज को अपने प्राण न गंवाने पड़े। किसी भी अस्पताल में मरीजों की तीमारदारी के लिए तैनात कर्मचारियों में पेशेवर कुशलता के साथ-साथ संवेदनशीलता भी जरूरी है।

वे अपनी ड्यूटी में जरा भी लापरवाही न बरतें, यह सुनिश्चित करना होगा। स्वास्थ्य सुरक्षा को ‘राष्ट्रीय प्राथमिकता’ के रूप में घोषित करना होगा। इस प्राथमिकता को बजट में ऊपर स्थान देना होगा, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं में आर्थिक सहायता प्रदान की जा सके। साथ ही स्वास्थ्य संबंधी उपकरणों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिल सके। इस उद्योग को ‘जीरो रेटिंग जीएसटी’ के अंतर्गत रखा जाए। ऐसी व्यवस्था की जाए कि इस क्षेत्र को ‘इनपुट टैक्स क्रेडिट’ का लाभ मिल सके। हमें इस बात को समझना होगा कि बीमारी या रोग व्यक्तिगत नहीं होते। इसका निराकरण समग्र रूप से किया जा सकता है। हमारी स्वास्थ्य सेवाओं का आधार अब लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की शिक्षा देने पर होना चाहिए। हमारे देश की इस जटिल समस्या को सुलझाने के लिए कोई जादुई मंत्र तो नहीं है, जो क्षणभर में कायापलट कर दे, पर ऐसा भी नहीं कि हम अपेक्षित उपायों को तत्परता से अपना कर इसे सुलझा न सकें।