ज्योतिर्मय

भारत में छह ऋतुएं मानी गई हैं। आयुर्वेद के अनुसार इन्हें वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर कहा गया है। लेकिन खास तौर पर तीन ऋतुएं ही हैं- शीत, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु। कुछ मनीषियों ने तो वर्षा के भी दो भाग कर दिए और कहा कि दोनों ऋतुओं में – सर्दी गर्मी असल है, बाकी बारिश तो सर्दी में भी होती हैं और गरमी में भी। उनके अनुसार सर्दी और गरमी ही मौसम है, वर्षा तो आसमानी है। सूर्य की भी सिर्फ दो गतियां ही होती हैं- आदान और विसर्ग काल। एक काल में सूर्य उत्तर की ओर गति करता है और दूसरे भाग में -विसर्ग काल में- दक्षिण की ओर। आदान काल में शिशिर, वसंत एवं ग्रीष्म ऋतुएं और विसर्ग काल में वर्षा एवं हेमंत ऋतुएं होती हैं। आदान के समय सूर्य बलवान और चंद्र क्षीण रहता है। वसर्ग काल में चंद्रमा बलवान,सूर्य क्षीणबल रहता है।

मनीषियों ने तो सूक्ष्मतम विभाजन कर सुबह-दोपहर-शाम तक तथा और यहां से भी आगे घड़ी पल तक, के विभाजन कर उनके अनुसार दिनचर्या का निर्धारण किया। अभी हेमंत ऋतु शुरू हुई है। आचार्य बालकृष्ण के अनुसार मोटे तौर पर तीनों मौसम के अनुसार शरीर में परिवर्तन आते हैं। तीन मौसम छ: ऋतुओं में बांटे गए हैंं- वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर। ऋतुएं दो-दो मास की होती हैं। चैत्र-वैशाख में वसंत, ज्येष्ठ-आषाढ़ में ग्रीष्म, श्रावण-भाद्रपद में वर्षा, आश्विन-कार्तिक में शरद, मागर्शीर्ष-पौष में हेमंत और माघ-फाल्गुन में शिशिर ऋतु होती है। त्योहार के रूप में वसंत माघ मास में आता है। उपरोक्त क्रम से वसंत चैत्र मास में आना चाहिए। क्रम को सही शुद्ध रखने के लिए शेष पांचों ऋतुओं द्वारा वसंत को सात-सात दिन देने की कथा चली और कालिदास जैसे ऋतुओं के कवि पर भी छा गई। खान-पान के साथ इन ऋतुओं और हवा पानी का भी प्रभाव पड़ता है। किसी ऋतु में कोई दोष बढ़ता है, तो कोई शांत भी होता है। दूसरी ऋतु में दूसरा कोई दोष बढ़ता और अन्य कोई शांत होता है। ऋषियों ने उन ऋतुओं में दोषों की होने वाली वृद्धि, प्रकोप और शांति का

अध्ययन किया गया और खान-पान और रहन-सहन (आहार-विहार) के लिए निर्देश दिए। उन निर्देशों के अनुसार रहने पर स्वास्थ्य की रक्षा होती और निर्वाह हो।
पूरे वर्ष में सूर्य दो मार्गों से विचरण करता दिखाई देता है। नई खोजों के अनुसार सूर्य तो अपने स्थान पर करीब-करीब स्थिर ही रहता है, पृथ्वी और सौरमंडल के दूसरे ग्रह ही भ्रमण करते हैं। चलिए मानते हैं, पर उस नई जानकारी से कोई फर्क नहीं पड़ता, सूर्य से पहले भी वही बदलाव आते थे और अब भी वैसे ही परिवर्तन आते हैं। दक्षिणायन शब्द दक्षिण और अयन पदों से बना है। अयन का अर्थ गति है। इसमें सूर्य की गति दक्षिण की ओर होती है। सूर्य की किरणों के मंद और सौम्य होने से वातावरण में रस (जलीय तत्त्व) की वृद्धि होती है, इसे विसर्ग काल कहते हैं। सौम्य अवस्था में होने के कारण सूर्य और चंद्र से वातावरण में रस का संचार होता है। इसमें हवाएं आदान काल की तरह शुष्क, गर्म और रूखी नहीं होतीं। वातावरण में चंद्रमा के सौम्य गुणों की प्रधानता होती है और ताप कम होता है। हवाओं, बादलों और वर्षा में ठंडक रहती है। सब जगह चंद्रमा की शीतलता रहती है। वातावरण की शीतलता के कारण औषधियों और खाद्य पदार्थों में स्निग्धता आ जाती है। इससे मनुष्यों एवं अन्य प्राणियों की शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है।

उत्तरायण का भाव है सूर्य की उत्तर दिशा की ओर गति। चैत्र से भाद्रपद उत्तरायण में आते हैं। यह आदान काल भी कहलाता है, क्योंकि इस समय का प्रचंड सूर्य रस (जलीय तत्त्व) का आदान (ग्रहण) करता है। सूर्य की किरणें प्रखर और हवाएं तीव्र, गर्म और रूक्ष होती हैं, ये पृथ्वी के जलीय अंश को सोख लेती हैं। इसका प्रभाव सभी औषधियों के साथ-साथ मनुष्य के शरीर पर भी पड़ता है। इससे शारीरिक शक्ति में कमी होने लगती है और व्यक्ति दुर्बलता का अनुभव करता है। इस अवधि में शिशिर, वसंत और ग्रीष्म ऋतुएं आती हैं। विसर्ग और आदान काल के असर से आदान काल के अंत और विसर्ग के शुरु में दुर्बलता अधिक रहती है। इन दोनों कालों के बीच के समय में मनुष्यों में बल भी मध्यम स्थिति में रहता है। विसर्ग काल के अंत एवं आदान काल के आरंभ में शरीर में बल की प्राप्ति अधिक होती है। इन बातों के आधार पर, ही आयुर्वेद ने ऋतुओं के अनुसार अलग तरह को खानपान का वर्णन किया है।

अभी शिशिर ऋतु है। स्वास्थ्य के लिए यह सबसे अच्छी मानी गई है। इस समय शरीर सबसे अधिक बलयुक्त होता है। दिन छोटे तथा रातें लंबी होने के कारण शरीर को आराम करने के साथ-साथ भोजन के पाचन के लिए भी अधिक अनुकूलता मिलती है। इन दोनों कारणों से सर्दी में अधिक पुष्टि मिलती है तथा भूख भी अधिक लगती है। इस प्रकार पाचन-शक्ति तेज होने से भारी और अधिक मात्रा में लिया गया आहार भी आसानी से पच जाता है। हेमंत और शिशिर ऋतु में ऋतुओं में ( प्राय: दिसंबर से मार्च) तक मौसम प्राय: एक सा होता है। हेमंत-ऋतु में सूर्य दक्षिणायन में होता है, अत: औषधियों एवं आहार-द्रव्यों में स्निग्धता, मधुर रस और पौष्टिकता होती है। इस ऋतु में शरीर में दोषों का संचय अल्प मात्रा में होता है। परंतु शिशिर ऋतु में सूर्य के उत्तरायण में होने से आदान काल के कारण वातावरण में रूक्षता और शीतलता होती है। वनस्पतियों में भी शीतलता, भारीपन और मधुरता होने से शरीर में कफ का संचय होता है। अत: शिशिर ऋतु में भी उपर्युक्त आहार-विहार करते हुए ठंड से बचाव रखना चाहिए। शीतल, हल्के और रूक्ष पदार्थों का सेवन एवं उपवास नहीं करना चाहिए।
ऋतु अनुकूल आहार विहार रख कर आसानी से स्वस्थ रहा जा सकता है। आज कल रोगों का बड़ा कारण स्नायुओं की दुर्बलता या तनाव भी बड़ा कारण है। इसे दूर करने में प्रार्थना बड़ी सहायक सिद्ध होती है। उससे आत्मविश्वास बढ़ता और निडरता आती है, शांति मिलती तथा नसों स्नायुओं में शिथिलता आती है। शवासन भी मानसिक तनाव के कारण होने वाले रोगों से बचने के लिए सहायक होता है। एक बात ध्यान रखी जानी चाहिए कि ऋतुचर्या में वर्णित आहार-विहार का सेवन करते हुए ऋतुसंधि अर्थात ऋतु के अंतिम और आने वाली ऋतु के प्रथम सप्ताह में पहले वाले आहार-विहारों को धीरे-धीरे छोड़ कर ही नई ऋतु के लिए बताए गए आहार-विहार का सेवन आरंभ करना चाहिए।

पहले लिए जाने वाले आहार आदि को एकदम छोड़ कर पूरी तरह नए आहार आदि का सेवन करने से प्रतिकूल की स्थिति बन जाती है। और इससे रोग उत्पन्न हो सकते हैं।