आज लगभग दुनिया के सभी देशों में बच्चों की शारीरिक वृद्धि में रुकावट एक बड़ी समस्या है। वहीं एक शोध से पता चला है कि भारतीय बच्चे पेरू, वियतनाम और इथोपिया की तुलना में इस समस्या से अधिक ग्रसित हैं। भारत के बच्चों की किशोरावस्था में ही वृद्धि रुक जाती है। यह अध्ययन अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी और हार्वर्ड टीएच चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं ने किया है। शोध के लिए 2002 तथा 2016 के बीच भारत, इथोपिया, पेरू और वियतनाम के कुल 7,128 बच्चों को लेकर पांच चरणों में सर्वेक्षण किया गया।
शोध में ग्रामीण एवं शहरी तथा गरीब और अमीर सभी तबके के बच्चों को शामिल किया गया था। सर्वेक्षण में पेरु, इथोपिया और वियतनाम में पूरे देश से जबकि भारत में सिर्फ आंध्र प्रदेश के बच्चों को लिया गया था। इन बच्चों के एक, पांच, आठ, बारह और पंद्रह साल के होने पर उनकी वृद्धि में रुकावट संबंधी आंकड़ों का व्यापक विश्लेषण किया गया। शोध में पाया गया कि इन चारों देशों में औसतन 43 फीसद बच्चे एक से पांच साल की उम्र में ही वृद्धि अवरोध (स्टन्टिंग) से ग्रस्त हो गए थे। इन बच्चों में से लगभग 32-41 फीसद बच्चे किशोरावस्था तक भी ठीक नहीं हो पाए। हांलाकि लगभग 31-34 फीसद बच्चों में सुधार हुआ लेकिन वयस्क होने के पहले वे इससे फिर से ग्रसित हो गए। अध्ययन में यह भी पाया गया कि पांच साल तक सामान्य वृद्धि कर रहे बच्चों में से भी 13.1 फीसद बच्चों की वृद्धि 8 से 15 साल के बीच रुक गई।
शोधकर्ताओं ने पाया कि अधिकांश बच्चे कई कारणों से बचपन और प्रारंभिक किशोरावस्था के बीच अपनी उम्र के अनुरूप बढ़ नहीं पाते हैं। भौगोलिक स्तर पर बच्चों में वृद्धि अवरोध, उसमें सुधार तथा दुबारा वृद्धि रुकने की प्रवृत्तियों में उल्लेखनीय भिन्नता दिखी। एक साल वाले बच्चों को छोड़कर शेष सभी चरणों में भारतीय बच्चों में वृद्धि में रुकावट का प्रतिशत सबसे अधिक देखा गया है। एक साल के बच्चों में वृद्धि में रुकावट का फीसद इथोपिया में सर्वाधिक 41 पाया गया, जो भारत में 30 फीसद था। इथोपिया को छोड़कर बाकी तीनों देशों में एक वर्षीय बच्चों की तुलना में पांच वर्षीय बच्चों में वृद्धि अवरोध ज्यादा दिखा। शोधकर्ताओं के अनुसार हालांकि उम्र बढ़ने के साथ साथ वृद्धि अवरोध की समस्या में उल्लेखनीय कमी दिखी। लेकिन भारत में बाकी देशों की तुलना में पांचों चरणों में बच्चों और किशोरों में वृद्धि अवरोध की समस्या लगभग एक जैसी ही रही। भारत में किशोरों में वृद्धि अवरोध सबसे ज्यादा 27 फीसद, वहीं वियतनाम में सबसे कम 12.3 फीसद थी।
इस शोध में भारतीय मूल के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर एसवी सुब्रमण्यन के अलावा जेवेल गॉसमैन और रॉकली किम भी शामिल थे। प्रोफेसर एसवी सुब्रमण्यन ने बताया, ‘बच्चों में वृद्धि अवरोध एक प्रतिवर्ती क्रिया है, जो कई परिस्थितियों जैसे आनुवांशिक, आर्थिक और भौगोलिक पर निर्भर होती है। वैसे तो बच्चे बचपन से लेकर किशोरावस्था तक कभी भी इसके शिकार हो सकते हैं, लेकिन अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर उनमें पुन: वृद्धि हो सकती है। हालांकि कई बार ठीक हुए बच्चों में भी प्रतिकूल परिस्थितियों से दुबारा वृद्धि रुक जाने का खतरा होता है। अत: बच्चों में किशोरावस्था तक भी उनकी वृद्धि रुकने के बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत है।’
शोध के फलस्वरूप प्रारंभिक 1000 दिनों के साथ किशोरावस्था तक भी बच्चों की वृद्धि पर पर्याप्त ध्यान दिया जाए तो उनकी रुकी हुई वृद्धि का हल हो सकता है। यह अध्ययन भविष्य में इन चारों देशों में बचपन से किशोरावस्था तक बच्चों की वृद्धि की प्रवृत्तियों का पता लगाने में सहायक साबित हो सकता है। वहीं इससे बच्चों में वृद्धि अवरोध से मुक्ति और सुधार के लिए नीति निर्धारकों को बेहतर समझ भी मिल सकती है।

