आज का क्रिएटिव स्पेस जितना खुला और तेज़ है, उतना ही कठोर भी हो गया है। सोशल मीडिया ने कलाकारों, संगीतकारों, लेखकों और पब्लिक फिगर्स को सीधे ऑडियंस से जोड़ दिया है। यह जुड़ाव जहां सराहना और प्यार लाता है, वहीं क्रिटिसिज़्म, ट्रोलिंग और सार्वजनिक शर्मिंदगी भी साथ लाता है। समस्या तब शुरू होती है जब यह क्रिटिसिज़्म स्वस्थ फीडबैक से आगे बढ़कर मानसिक दबाव बन जाती है और एक ब्रेकिंग पॉइंट तक पहुंच जाती है। हाल ही में नेहा कक्कड़ ने सोशल मीडिया पर मिले बैकलैश के बाद रिश्तों और काम से ब्रेक लेने की बात साझा की। यह कोई अकेली घटना नहीं है। यह उस बड़े मानसिक पैटर्न की ओर इशारा करती है, जिससे आज कई क्रिएटिव प्रोफेशनल्स जूझ रहे हैं, लेकिन खुलकर कह नहीं पाते। आइए , गेटवे ऑफ हीलिंग की संस्थापक, निदेशक और मनोचिकित्सक डॉ. चांदनी तुगनैत से जानते हैं कैसे ऑनलाइन ट्रोलिंग और क्रिटिसिज्म मेंटल ट्रॉमा बन सकता है और क्रिएटिव प्रोफेशनल्स के लिए ब्रेक लेना क्यों जरूरी है…

मनोचिकित्सक डॉ. चांदनी तुगनैत के अनुसार, रचनात्मक लोग अपने काम से भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं, इसलिए आलोचना उनके आत्म-सम्मान को प्रभावित करती है। ब्रेक लेना हार नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को बचाने का एक तरीका है। दर्शकों को भी सहानुभूति और जिम्मेदारी से पेश आना चाहिए।

ऑनलाइन क्रिटिसिज़्म अब सिर्फ राय नहीं रही

पहले क्रिटिसिज़्म सीमित दायरे में होता था। आज वह सार्वजनिक, स्थायी और लगातार होता है। एक वीडियो, एक बयान या एक पल की गलती पर हज़ारों लोग अपनी राय देने लगते हैं। इनमें से कई टिप्पणियां व्यक्तिगत होती हैं, अपमानजनक होती हैं और इंसान की पहचान पर हमला करती हैं। ‘तुम ऐसे हो’, ‘तुम्हें यह नहीं करना चाहिए’, ‘तुम ओवरड्रामैटिक हो’ जैसी बातें धीरे-धीरे व्यक्ति की मानसिक संरचना को प्रभावित करने लगती हैं। साइकोलॉजिकल पर्सपेक्टिव से देखा जाए, तो लगातार नेगेटिव इनपुट दिमाग को खतरे की स्थिति में डाल देता है। नर्वस सिस्टम लगातार अलर्ट मोड में रहता है। शरीर और मन दोनों को लगता है कि हमला जारी है, भले ही वह स्क्रीन के ज़रिए ही क्यों न हो।

क्रिएटिव्स पर असर ज़्यादा क्यों पड़ता है

मनोचिकित्सक डॉ. चांदनी तुगनैत के अनुसार, क्रिएटिव लोग अपने काम में भावनात्मक रूप से गहराई से जुड़े होते हैं। उनका काम सिर्फ स्किल नहीं, उनकी पहचान का हिस्सा होता है। जब उस काम पर हमला होता है, तो वह क्रिटिसिज़्म सीधे आत्मसम्मान तक पहुंच जाता है। यह कहना कि ‘काम को व्यक्तिगत मत लो’ व्यवहार में इतना आसान नहीं होता, खासकर तब जब वही काम आपकी आवाज़, चेहरा और भावनाएँ लेकर सामने आता है।

कई क्रिएटिव्स हाई-फंक्शनिंग होते हैं। हाई-फंक्शनिंग होने का मतलब है कि इंसान बाहर से तो सामान्य और सफल दिखता है, लेकिन अंदर ही अंदर वह भारी मानसिक तनाव से जूझ रहा होता है। वे मंच पर परफॉर्म करते हैं, कैमरे के सामने मुस्कुराते हैं और प्रोफेशनल बने रहते हैं। लेकिन भीतर ही भीतर वे थकते जाते हैं। वे खुद से सवाल करने लगते हैं। क्या मैं काफी अच्छा हूँ। क्या मुझसे गलती हो गई। क्या मुझे रुक जाना चाहिए।

जब बैकलैश ट्रॉमा बन जाता है

लगातार ऑनलाइन क्रिटिसिज़्म का असर सिर्फ अस्थायी दुख तक सीमित नहीं रहता। यह धीरे-धीरे एंग्ज़ायटी, स्लीप डिस्टर्बेंस, भावनात्मक सुन्नता और आत्म-संदेह में बदल सकता है। कुछ लोगों में यह पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस जैसे लक्षण भी पैदा कर देता है, जहाँ व्यक्ति हर अगली प्रतिक्रिया से डरने लगता है।

थेरेपी में अक्सर यह देखा जाता है कि ऐसे क्लाइंट्स खुद को दोष देने लगते हैं। वे सोचते हैं कि शायद उन्हें ज़्यादा मज़बूत होना चाहिए था। लेकिन सच्चाई यह है कि लगातार सार्वजनिक क्रिटिसिज़्म किसी भी इंसान के लिए मानसिक रूप से भारी होता है।

ब्रेक लेना हार नहीं है

हमारी संस्कृति में ब्रेक लेना अब भी कमजोरी की तरह देखा जाता है। खासकर पब्लिक फिगर्स के लिए। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे हर क्रिटिसिज़्म को नज़रअंदाज़ करें और आगे बढ़ते रहें। लेकिन साइकोलॉजिकल रूप से, ब्रेक लेना एक सेल्फ-रेगुलेटिंग कदम होता है। यह दिमाग और शरीर को यह संदेश देता है कि अब सुरक्षा ज़रूरी है। जब कोई क्रिएटिव ब्रेक लेता है, तो वह भाग नहीं रहा होता। वह खुद को बचा रहा होता है। यह रिकवरी की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।

ऑडियंस की भी ज़िम्मेदारी

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ने सभी को आवाज़ दी है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी आती है। किसी की कला पसंद न आना एक बात है। किसी इंसान को नीचा दिखाना दूसरी। क्रिटिसिज़्म और क्रूरता के बीच की रेखा बहुत पतली होती है और अक्सर पार कर ली जाती है। हमें यह याद रखने की ज़रूरत है कि स्क्रीन के उस पार भी एक इंसान है, जिसकी भावनाएं, सीमाएं और मानसिक स्वास्थ्य है।

निष्कर्ष

अगली बार जब आप किसी पोस्ट पर ‘कमेंट’ करने से पहले रुकें और सोचें कि क्या आपकी राय किसी की मानसिक शांति छीन सकती है? क्या आप सोशल मीडिया पर अधिक सहानुभूति (Empathy) दिखाने के लिए तैयार हैं?