मांडवी मिश्रा
फिल्म को फिल्म के बाद भी जिंदा रखने के लिए संगीत का बहुत बड़ा हाथ होता है। हिंदी फिल्म उद्योग को अपने लिखे गीतों के बोलों से एक नया आयाम देने वाले गीतकार इरशाद कामिल, असल जीवन में भी अपने गीतों की तरह ही आसान और जमीन से जुड़े व्यक्ति हैं। उनके ‘पटाखा गुड्डी’ जैसे गानों में लोक गीत की महक है, तो ‘मटरगश्ती’ और ‘हीर’ जैसे गानों में ताजगी है। ‘नादान परिंदे’ में बाबा शेख फरीद के बोल हों, या कॉकटेल के ‘मैं शराबी’ जैसे गानों में कव्वाली से ली गई प्राकृतिक प्रेरणा नजर आती है। एक दशक से भी ज्यादा समय से हिंदी गीतों में लोक गीतों की सुगंध बिखेरने वाले इरशाद का मानना है कि जब आपको क्या नहीं करना पता लग जाए, तो फिर क्या करना है वह खुद ब खुद समझ में आ जाता है।
हाल ही में हिंदी फिल्म ‘भारत’ और ‘कबीर सिंह’ में मधुर गाने दे चुके इरशाद की किताबें ‘काली औरत का ख्वाब’ और ‘एक महीना नज्मों का’ को भी पाठकों ने खूब पसंद किया। करिअर में पारिवारिक सहयोग के बारे में कहते हैं, ‘परिवार गैर-परंपरागत रास्तों पर सहयोगी नहीं होते। मैंने भीतरी और बाहरी काफी संघर्ष किया है और अब भी कर रहा हूं’। इम्तियाज अली के साथ ‘जब वी मेट’, ‘रॉकस्टार’, ‘हाइवे’ और ‘तमाशा’ को इरशाद के बेहतरीन कामों में गिना जाता है।
इरशाद कहते हैं कि हम शायद फिल्म में गीतकारी की अहमियत समझते हुए उस पर ज्यादा समय और ऊर्जा खर्च करते हैं। इसके साथ ही इरशाद का ‘द इंक बैंड’ भी श्रोताओं के दिलों पर राज कर रहा है। इरशाद का कहना है कि यह देश का पहला पोएट्री बैंड है जो एक किस्म की जुगलबंदी है शब्द, संगीत और गायकी के बीच। इस जुगलबंदी में शायरी ड्राइविंग सीट पर होती है न कि संगीत के पीछे दौड़ती हुई। बहुत जल्दी ‘द इंक बैंड’ अपना सीजन-2 लेकर आ रहा है जिसमें शायरी सिर्फ कल्पनाओं के आसमान पर ही उड़ान नहीं भरेगी बल्कि वास्तविकता की जमीन पर भी उतरेगी। आजकल अच्छा गीत संगीत या साहित्य नहीं बन रहा जैसे आरोपों पर इरशाद का कहना है कि लोगों की पसंद खराब है। जो बिकता नहीं वो कभी बनता नहीं। व्यवसाय ने अच्छे साहित्य, गीत या संगीत की ही नहीं अच्छी पत्रकारिता की भी गुणवत्ता छीनी है। ‘साड्डा हक’, ‘छीन के लेंगे अपना हक’, ‘चल तू अपना काम कर’ जैसे गीत के साथ कविताएं भी लिखता हूं।
दायरे में रहते हुए मैं जितना बदलाव लाने की कोशिश कर सकता हूं वह कर रहा हूं। शायरी और कविता के इतर गीत लिखने की चुनौती पर इरशाद कामिल कहते हैं कि यह एक ऐसी चीज है जो आप अपने लिए नहीं लिख रहे होते, अपनी मनोदशा के अनुसार नहीं लिख रहे होते, आपके पास छंद को अपनी मर्जी से चुनने की मोहलत नहीं होती और आप लोक प्रचलित भाषा का प्रयोग करने की कोशिश करते हैं। अपने मन से कविता, गजल या शायरी लिखना आसान होता है बजाय गीत लिखने के जो किसी परिस्थिति या फिल्म के लिए होता है। फिल्मों के लिए गीत लिखने की सबसे अच्छी बात यह है कि आप मानसिक रूप से एक रचनात्मक जोन में रहते है और सबसे बुरी बात ये है कि रचनात्मक क्षेत्र में रहते हुए भी व्यावसायिक सोच आपसे छूट नहीं पाती।
