The Tashkent Files Movie review: भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु (1966) को लेकर कुछ षड्यंत्र-सिद्धांत प्रचलित रहे हैं और कुछ लोगों की निगाह में यह स्वाभाविक मुत्यु नहीं बल्कि हत्या थी। निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने शास्त्री की मृत्यु को अस्वाभाविक मानते हुए यह फिल्म बनाई है। दीगर बात है कि फिल्म की शुरुआत में यह बता दिया गया है कि इसमें कुछ जगहों पर सिनेमाई आजादी ली गई है। इतना कह देने के बाद फिल्म की विश्वसनीयता वाला पहलू खत्म हो गया और यह भी एक षड्यंत्र-सिद्धांत ही बन गई है। फिल्म थोड़ा दिखाइए, ज्यादा समझिए वाले तरीके की है। अगर यह फिल्म डॉक्यूमेंट्री की तरह बनती तो शायद ज्यादा विश्वसनीय होती।
बहरहाल, फिल्म का किस्सा यह है कि श्वेता बसु प्रसाद इसमें रागिनी नाम की पत्रकार बनी हैं। रागिनी पर दबाव है कि वह जल्द ही एक खास खबर लाए। वह इसी उधेड़बुन में है कि क्या करे कि उसे एक सूत्र मिलता है- लाल बहादुर शास्त्री की मत्यु से संबंधित। रागिनी खोजबीन जारी रखती है और उसके सामने इस मामले को लेकर नए पहलू उभरने लगते हैं। उसकी सक्रियता की वजह से एक समिति गठित होती है जिसमें पीकेआर नटराजन (नसीरुद्दीन शाह) और श्याम सुंदर त्रिपाठी (मिथुन चक्रवर्ती) जैसे नेता और इतिहासकार आयशा अली शाह (पल्लवी जोशी) सहित और भी कुछ लोग हैं।
निर्देशकीय कल्पना के बाद फिल्म इसी निष्कर्ष पर पहुंचती है कि शास्त्री जी की हत्या की गई और जिन्होंने हत्या का ये सारा खेल रचा था, वो राजनीति और सत्ता में जमे हुए लोग थे। विनय पाठक ने इसमें पूर्व जासूस मुख्तार की भूमिका निभाई है जो रागिनी की मदद करता है। ‘द ताशकंद फाइल्स’ शास्त्री की मृत्यु संबंधित गुत्थियां तो नहीं सुलझाती लेकिन इसमें कुछ कलाकारों द्वारा बेहतरीन अभिनय है। एक तो खुद श्वेता बसु प्रसाद का और दूसरा मिथुन चक्रवर्ती का।
निर्देशक- विवेक अग्निहोत्री, कलाकार- श्वेता बसु प्रसाद, नसीरुद्दीन शाह, मिथुन चक्रवर्ती, पंकज त्रिपाठी, विनय पाठक, पल्लवी जोशी, विनय पाठक, मंदिरा बेदी
