‘बैलाडीला’ छत्तीसगढ़ के दांतेवाड़ा जिले का एक पहाड़ी इलाका है। यहाँ की पहाड़ियों के कंगूरे दूर से देखने पर बैल के डील की तरह नजर आते हैं इसलिए स्थानीय लोग इसे ‘बैलाडीला’ कहने लगे। छत्तीसगढ़ में बैल की डील की तरह दिखने वाली पहाड़ियाँ भी हैं, इसकी चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि यहाँ फिल्मकार शैलेन्द्र साहू का बचपन गुजरा और उन्होंने अपने आत्म-कथात्मक (ऑटोबॉयोग्राफिकल) फिल्म का नाम इस जगह के नाम पर ‘बैलाडीला’ रखा।
सिनेमा की भाषा में अगर इस इंडिपेंडेंट फिल्म की ‘वन लाइन स्टोरी’ बतानी हो तो यह फिल्म के लेखक-निर्देशक शैलेन्द्र साहू के उस जीवन की कहानी है, जब एक किशोर के अन्दर चित्रकार, लेखक व फिल्मकार बनने के बीज पड़े। यह फिल्म कोई कहानी सुनाने के बजाय सेल्फ एक्सप्रेशन या सेल्फ एक्सप्लोरेशन के लिए सिनेमा को माध्यम बनाती है। बहुत सम्भव है कि साहू ने अपने बचपन के उस हिस्से को शब्दों में, चित्रों में भी व्यक्त करने का इसके पहले प्रयास किया हो। नए माध्यम को हस्तगत करने के बाद कलाकार उसी हिस्से को छवियों में भी व्यक्त कर रहा है। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि बचपन की वह अमिट स्मृतियाँ उसके जहन में दृश्यों के रूप में ही अंकित हों, जैसा कि आमतौर पर होता है।
विश्व सिनेमा में फिल्म निर्माण की दो धाराएँ रेखांकित की गयी हैं। एक वह धारा जिसमें फिल्मों का प्राथमिक उद्देश्य फिल्म कैमरे के माध्यम से मनोरंजन सिनेमा तैया करना होता है। दूसरी धारा में वह फिल्में आती हैं जो फिल्म कैमरे का उपयोग आत्म-अभिव्यक्ति या अन्वेषण के लिए करती हैं। साहू की फिल्म देखने वाले का मनोरंजन करने का प्रयास नहीं करती है। वह अपनी चाल से चलती है, अपने बहाव में आगे बढ़ती है और कॉन्फ्लिक्ट, प्लाट-प्वाइंट और क्लाइमेक्स इत्यादि टेक्निकैलिटी का ख्याल किए बिना अपने जहन में मौजूद इम्प्रेशंस (स्मृति-छाया) को कैमरे पर दर्ज करने का प्रयास करती है।
फिल्मकार को शायद इस बात की ज्यादा परवाह नहीं है कि दर्शक को फिल्म देखकर कैसा लगेगा। उसे इसकी ज्यादा परवाह है कि उसे उस वक्त जैसा महसूस हुआ वह अनुभव पर्दे पर उसी सघनता और प्रामणिकता से दर्ज हुआ है या नहीं। इस लिहाज से यह फिल्म एक कलात्मक अभिव्यक्ति है जो किसी अन्य (दर्शक) की परवाह किए बिना स्वयं को व्यक्त करती है।
‘बैलाडीला’ को देखने के बाद तुरन्त ही फ्रांस्वा त्रुफो की 1959 में रिलीज हुई फ्रेंच फिल्म Les quatre cents coups (The 400 Blows) की याद आती है। सिने इतिहास में जिसे ‘फ्रेंच न्यू वेव’ कहा जाता है, उसमें त्रुफो और उनकी फिल्म को संगेमील माना जाता है। त्रुफो की फिल्म का सेंट्रल प्लॉट यही है कि ‘एक किशोर का मन कैसे निर्मित होता है’ और वह किशोर कोई और नहीं खुद त्रुफो हैं। त्रुफो ने अपनी फिल्म में केवल कहानी के स्तर पर नवाचार नहीं किया था बल्कि उसे पर्दे पर कहने के लिए नया सिने व्याकरण भी प्रस्तुत किया था।
पार्श्व संगीत, संवाद और कैमरा शॉट, में नवाचार के माध्यम से त्रुफो दर्शक पर वह असर डालते हैं जिससे दर्शक अपने किशोर-मन की निर्मिति का स्मरण करने लगता है। त्रुफो की कहानी आधी निजी है मगर वह उन सार्वजनिन विषयों को केन्द्र में ले आती है जिनसे ज्यादातर किशोर मन गुजरे होते हैं। इस तरह त्रुफो की फिल्म पर्सनल होने के साथ ही यूनिवर्सल भी बन जाती है।
The 400 Blows ‘बैलाडीला’ भी एक किशोर मन के वर्जित विषयों (नशा, यौन सम्बन्ध, अवैध सम्बन्ध, धोखा, चोरी इत्यादि) से पहली बार सामना होने को चित्रित करती है। विषय-वस्तु और थीम समान होने के बावजूद सिनेमा के उपकरण और शिल्प के प्रयोग, नवोन्मेष और दर्शक के मन पर असर के मामले में ‘बैलाडीला’ कितनी सफल है, यह फिल्मकार के विचार का विषय है।
‘बैलाडीला राष्ट्रीय फिल्म निर्माण निगम लिमिटेड (NFDC) के सहयोग से बनी है। फिल्म छत्तीसगढ़ की स्थानीय भाषा और हिन्दी का मिलाजुला प्रयोग करती है। मीडिया में इसे छत्तीसगढ़ी फिल्म के रूप में प्रस्तुत किया गया। फिल्म को फ्रांस के प्रतिष्ठित कान फिल्म फेस्टिवल में अतिथि देश भारत की पाँच फिल्मों में भी चुना गया। फिल्म को मुंबई के प्रतिष्ठित मामी (MAMI) फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाया गया मगर अभी तक यह सिनेमा हॉल या बड़े ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज नहीं हो सकी है।
फिल्म को जब कान में भेजा गया उसके बाद मीडिया से बातचीत में शैलेन्द्र साहू ने पूछा था, “बचपन में हम लोगों को लगता था कि पैसे वाले लोग और बड़े लोग ही बना सकते हैं। डिजिटल कैमरा आने से हम फिल्म बना पा रहे हैं। फिल्म बना तो लेंगे मगर दिखाएँगे कहाँ!” सिनेमा मनोरंजन के साथ-साथ कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में भी जिन्दा रहे इसके लिए जरूरी है कि एनएफडीसी इस प्रश्न पर विचार करे।
