Mahabharat 16 April 2020 Updates: किसके मन में क्या चल रहा है, श्री कृष्ण भली-भांति जानते हैं।श्रीकृष्ण युधिष्ठिर का मनोबल बढ़ाते हुए कहते हैं कि अपनी राज्य सीमाओं को सुरक्षा कवच दो। पड़ोसी राज्यों से मित्रता बढ़ाओ। इौस सन्नाटे के पार जो आंधी पनप रही है उसे सुनो। ‘अपमानित होकर रहे शत्रु जहां चुपचाप, वही मौन तूफान की है पहली पदचाल। राज्य न जीतो जीतलो अपने हित के मीत मीत बढ़ेंगे प्रीत से वही सही है जीत।’
बलराम ने सुभद्रा की शादी के लिए दुर्योधन का प्रस्ताव अपने माता पिता को दिया है। वहीं कृष्ण बलराम से कहते हैं कि अभी हमें इस मामले पर सोचना चाहिए। बलराम को कृष्ण पर थोड़ा थोड़ा शक होता है कि कहीं वो कुछ गड़बड़ न कर दें। सुभद्रा के माता-पिता ने ये फैसला किया है कि वो अगले दिन इसपर फैसला सुनाएंगे। अगले दिन अर्जुन ने सुभद्रा का हरण कर लिया जिसके चलते बलराम को बहुत ज्यादा क्रोध आता है। कृष्ण, बलराम से कहते हैं कि हो सकता है कि सुभद्रा, दुर्योधन से विवाह नही करना चाहती हो इसलिए उसने ऐसा किया हो। कृष्ण की बात सुनकर बलराम को एहसास होता है कि हो न हो सुभद्रा भी कहीं न कहीं अर्जुन पर मोहित हो।

Highlights
अर्जुन ने सुभद्रा का हरण कर लिया है जिसके चलते बलराम को बहुत ज्यादा क्रोध आ गया है। कृष्ण, बलराम से कहते हैं कि हो सकता है कि हो सकता है कि सुभद्रा, दुर्योधन से विवाह नही करना चाहती हो इसलिए उसने वासा किया है। कृष्ण की बात सुनकर बलराम को एहसास होता है कि हो न हो सुभद्रा भी कहीं न कहीं अर्जुन पर मोहित हो।
सुभद्रा ने कृष्ण की बात मानते हुए सुबह पूजा में जाने का फैसला किया है। कृष्ण ने सुभद्रा से कहा कि तुम सुबह पूजा में जाओ वहां पर जरूर अर्जुन तुम्हारा हरण कर लेगा। सुभद्रा से कृष्ण ने कहा कि अपने बारे में निर्णय लिया जाता है आज्ञा नही मानी जाती है।
बलराम ने सुभद्रा की शादी के लिए दुर्योधन का प्रस्ताव अपने माता पिता को दिया है। वहीं कृष्ण बलराम से कह रहे हैं कि अभी हमें इस मामले पर सोचना चाहिए। बलराम को कृष्ण पर थोड़ा थोड़ा शक है कि कहीं वो कुछ गड़बड़ न कर दें। सुभद्रा के माता-पिता ने ये फैसला किया है कि वो अगले दिन इसपर फैसला सुनाएंगे।
सुभद्रा अर्जुन को देखकर उसे पहचान नही पाती और उससे ही अर्जुन के बारे में सवाल पूछती है। वैरागी का रुप लिए अर्जुन सुभद्रा से कहते हैं कि अर्जुन में ऐसी कोई बात नही है। जिसपर सुभद्रा काफी ज्यादा नाराज हो जाती हैं। आखिरकार वहां पर कृष्ण आ जाते हैं और अपनी बहन सुभद्रा से अर्जुन का परिचय करवाते हैं। सुभद्रा अर्जुन पर मोहित है और कृष्ण उसके और दुर्योधन के विवाह को लेकर पिता से बात करने वाले हैं।
दुर्योधन बलराम से काफी ज्यादा प्रसन्न हैं क्योंकि गदा युद्ध में उसने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। बलराम दुर्योधन से कहते हैं कि शिष्य मांगो तुम्हें क्या चाहिए जिसपर दुर्योधन उनसे सुभद्रा का हाथ मांगता है। बलराम दुर्योधन से कहते हैं कि सुभद्रा का हाथ मेरे पास नही है तो इसके लिए मैं कुछ नही कह सकता।
शकुनि को एकबार फिर पांडवों पर शक है कि हो न हो वो हमे घेरने के लिए घेरा बना रहे हैं। वहीं दुर्योधन भी अपने मामा शकुनि की बात सुनकर सोच में पड़ गया है। कर्ण मामा शकुनि को समझा रहा है कि अब हमे युद्ध की तैयारी करनी चाहिए। शकुनि ने चाल चलते हुए दुर्योधन की शादी सुभद्रा से करने का फैसला करा है।
अब तक आपने देखा कि दुर्योधन अपने स्वार्थ के साथ भैया बलराम के पास जा पहुंचता है। बलराम जी को दुर्योधन के साथ जाता देख वासुदेव कृष्ण कहते हैं कि आप अकेले ही दुर्योधन के साथ जांए क्योंकि मुझे तो विदुर, भीष्म और द्रोण से मिलने जाना है। अब इधर हस्तिनापुर छोड़ने का समय आया है। ऐसे में अर्जुन बहुत भावुक हो जाते हैं। वह कहते हैं कि वह भीष्म पितामह को छोड़ कर नहीं जा सकते। अर्जुन को रोता देख भीष्म कहते हैं कि वो पांडवों के साथ जाना तो चाहते हैं लेकिन वो अपनी प्रतिज्ञा में बंधे हैं जिसके चलते वो ऐसा नहीं कर सकते हैं।
अब श्रीकृष्ण पूछते हैं महाराज कैसी लली आपको आपकी कर्मभूमि, अब आपने राज्य तो स्थापित कर दिया। इस राज्य की सुरक्षा के बारे में सोचिए। श्रीकृष्ण बताते हैं कि अपनी राज्य सीमाओँ को सुरक्षा कवच दो। पड़ोसी राज्यों से मित्रता बढ़ाओ। इौस सन्नाटे के पार जो आंधी पनप रही है उसे सुनो। 'अपमानित होकर रहे शत्रु जहां चुपचाप, वही मौन तूफान की है पहली पदचाल। राज्य न जीतो जीतलो अपने हित के मीत मीत बढ़ेंगे प्रीत से वही सही है जीत।'
खांडवप्रस्त में पांडवों का कर्म शुरू हो चुका है। श्री कृष्ण और दाऊ भैया दोनों पांडवों की मदद कर रहे हैं। बंजर वन अब हराभरा हराथल हो चला है। मरुथल अब अनुपम उपवन बन चुका है। मनोहर उद्यान बन चुके है। धीरे धीरे वीराने में नगर बसा और बड़ा राजमहल बना।
अरावली की निर्दय पहाड़ियां, बांझ भूमि, के बीच आ गए हैं पांडव औऱ पांचाली। खांडवप्रस्त की हर चट्टान में आंखें आ गई हैं। हर पेड़ मानों स्वागत कर रहा है। नागवंशी औऱ असुर जातियों के लोग मानों तीरकमान संभाले हुए हैं क्योंकि वह किसी को अपने क्षेत्र में किसी को पांव जमाने नहीं देंगे। श्रीकृष्ण अब खांडवप्रस्त को पांडवों की कर्म भूमि कहते हैं। अर्जुन कहते हैं कि यहां मुझे तो आपके आशीर्वाद के अतिरिक्त कुछ नहीं दिख रहा है।
युधिष्ठर कहते हैं मैं तीन माताओं का पुत्र हूं। कुंती गांधारी औऱ ये हस्तिनापुर नगरी। मैं बेशक खांडवप्रस्त का राजा हो गया हूं लेकिन पुत्र मैं हमेशा हस्तिनापुर का ही रहूंगा।
पांचाली संग पांडवपुत्र खांडवप्रस्त के लिए हुए रवाना..भाष्म पितामह कहते हैं कि इस राज्य के साथ मेरा भी विभाजन हो गया है। आने वाला इतिहास तुमपर गर्व कर सके। ऐसे काम करना। एक क्षत्रिय की भांति जीना। क्षत्रिय का जीवन मानव अधिकारों की रक्षा करते हुए मरजाने के लिए होता है। गुरुवर कहते हैं कि महाराज आपको आज एख आखिरी पाठ पढ़ाता हूं- क्षत्रिय को युध की तरफ तब देखना चाहिए जब इसकी जरूरत हो।
भीष्मपितामह उठते हैं और राज्याभिषेक कार्य शुरू करने की आज्ञा मांगते हैं। इस बीच ऋषिवर आते हैं वह कहते हैं कि वह सिर्फ युधिष्ठर का राज्याभिषेक देखने आए हैं। इस बीच ऋषिवर पांचाली को चेताते हैं कि वह अपने केश का खयाल रखें।
हस्तिनापुर के युवराज की घोषणा: हमारे पिताश्री का ये राज दो हिस्सों मे बराबर बांटा जाए। एक भाग युधिष्ठर और दूसरा दुर्योधन को। खांडवप्रस्त युधिष्ठर और हस्तिनापुर का बचा हुआ हिस्सा दुर्योधन को मिलेगा। हर किसी को ये निर्णय पसंद आया है।
शकुनि अभी भी संतुष्ट नहीं है। वह कहता है कि आधा राज्य खोने का दुख है दुर्योधन को इसलिए नहीं आया। कर्ण सकारात्मक होकर कहता है आधा राज्य खोया नहीं आधा पाया है। शकुनि कहता है ये तो दृष्टिकोण का मतभेद है। राज्यसभा में अब पांडव पुत्र पांचाली संग आ पहुंचे हैं। लेकिन दुर्योधन अभी तक नहीं आया। महाराज से घोषणा करने की अपील की जाती है। धृतराष्ट्र अब ब्रह्मा विष्णु और महेश को प्रणाम करते हैं और गंगा पुत्र भीष्म को प्रणाम करते हैं।
कुंती कहती हैं कि पांचाली अब संभालो ये सब। पांचाली कहती हैं कि आपके बगैर मैं कैसे आपकी धरोहर संभालूंगी मैं कुछ नहीं जानती। इधर बारी आती है दरबार में जाने की। पांचों पांडव द्रौपदी के साथ दरबार जाते हैं तभी पांचाली कहती हैं माता आप नहीं चलेंगी? तो कुंती कहती हैं नहीं मैं जब ब्याहकर आई थी तो ये सब हो गया था अब राजदरबार जाकर क्या करूंगी?तुम जाओ औऱ सब देखो, मैं तपोवन में बठ कर तुम सबको आशीर्वाद दूंगी।
हो रहा युधिष्ठर का राज्याभिषेक: मां कुंती कहती हैं कि द्रौपदी तिलक लगाओ। ऐसे में अर्जुन कहते हैं कि मां आप लगाइए यह आशीर्वाद भी होगा हमारे लिए। तभी मां कुंती कहती हैं कि अब घर में बहू आ गई है तो वह अपने कर्तव्य निभाएगी। इसके बाद द्रौपदी युधिष्ठर का तिलक करती हैं।