कई सालों में एक बार ऐसी फिल्म आती है जो सिर्फ देखी नहीं जाती, बल्कि दर्शकों को अंदर तक हिलाकर रख देती है। गुजराती फिल्म ‘लालो’ ऐसी ही एक फिल्म है। महज 50 लाख रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने गुजराती में 120 करोड़ रुपये से ज्यादा का शानदार बिज़नेस किया और खुद को एक डिवाइन ब्लॉकबस्टर के तौर पर स्थापित किया। अब यही फिल्म हिंदी में भी रिलीज हो चुकी है।

फिल्म का निर्देशन किया है अंकित साखियां ने और इसमें करण जोशी, स्रुहद गोस्वामी और रीवा रच अहम भूमिकाओं में नजर आते हैं। कम बजट में बनी इस फिल्म को दर्शक जीवन बदलने वाला अनुभव बता रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि यह फिल्म उन्हें भीतर से हील कर रही है। आखिर ऐसा क्या है इस फिल्म में, जो लोगों को इतना गहराई से छू रहा है- आइए जानते हैं।

भागवत गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं— “तुम कर्म करो, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा।”
‘लालो’ का मूल संदेश भी यही है कि जब इंसान सही दिशा में एक्शन लेता है, तो ईश्वर का साथ अपने आप मिलने लगता है।

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कहानी है एक ऑटो ड्राइवर लालो की, जो अपनी पत्नी तुलसी और बेटी के साथ एक साधारण जीवन जीता है। ऑटो चलाकर परिवार का गुजारा करने वाला लालो धीरे-धीरे गलत आदतों में फंस जाता है। हालात ऐसे बनते हैं कि वह अपनी बेटी के सामने ही पत्नी से झगड़ता है। एक दिन लालो चोरी की नीयत से एक फॉर्महाउस में घुसता है, लेकिन वहीं फंस जाता है। इसके बाद वह किन-किन मुश्किलों का सामना करता है, कैसे उसे अपनी गलतियों का एहसास होता है और वह खुद को भीतर से कैसे बदलता है—यह सब फिल्म में बेहद सादगी और संवेदनशीलता के साथ दिखाया गया है।

फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि यह पुरुषों के इमोशन्स को सामने लाती है। अक्सर सिनेमा में मर्दों की भावनाओं पर बात नहीं होती—वे अंदर से कितने कमजोर, अकेले या खाली हो सकते हैं और बाहर से सिर्फ मेल इगो दिखाते हैं। ‘लालो’ इस परत को बहुत ईमानदारी से खोलती है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में पुरुष दर्शक इस फिल्म से गहराई से जुड़ रहे हैं और कई लोग फिल्म देखने के बाद भावुक होकर रोते हुए भी नजर आए।

अक्सर आस्तिकता और नास्तिकता को लेकर सवाल उठता है कि अगर भगवान हैं, तो बुरे वक्त में हमें बचाने क्यों नहीं आते। यह फिल्म दिखाती है कि कई बार जो गलत होता है, उसी के भीतर अच्छाई के बीज छुपे होते हैं—जो इंसान को खुद से मिलवाते हैं।

फिल्म का संगीत भी इसकी आत्मा है। इसमें 7 गाने हैं और सभी बेहद खूबसूरत हैं। मूल रूप से गुजराती में बने इन गानों को हिंदी में भी उतनी ही संवेदनशीलता के साथ डब किया गया है, जिससे उनकी भावना बरकरार रहती है।

हिंदी डबिंग फिल्म की बड़ी ताकत है। खास बात यह है कि डबिंग खुद उन्हीं कलाकारों ने की है जो स्क्रीन पर नजर आते हैं। इसी वजह से संवादों में गुजराती टच बना रहता है, जो फिल्म को और ज्यादा ऑथेंटिक बनाता है।

हालांकि फिल्म पूरी तरह परफेक्ट नहीं है। कुछ जगहों पर डायलॉग्स जरूरत से ज्यादा लगते हैं। खासतौर पर फॉर्महाउस वाले हिस्से में, जहां मूर्तियों से जुड़ा सीन सिर्फ विजुअल एक्शन से भी प्रभावी हो सकता था। इसके अलावा फिल्म का क्लाइमेक्स थोड़ा जल्दबाजी में समेटा गया लगता है, जिसे और अच्छे से पेश किया जा सकता था।

इन छोटी कमियों के बावजूद, ‘लालो’ एक स्वीट, सोलफुल और इंस्पायरिंग फिल्म है, जो दर्शकों को खुद के भीतर झांकने पर मजबूर कर देती है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसे आप पूरे परिवार के साथ बैठकर देख सकते हैं- और शायद खुद को थोड़ा बेहतर इंसान बनते हुए महसूस भी कर सकते हैं।