बरेली का झुमका अब तक मशहूर था। इस फिल्म के बाद बरेली की बर्फी की धाक भी जम सकती है। पर जरा सावधान दर्शकों, फिल्म में बर्फी के दर्शन नहीं होंगे। फिल्म में बरेली की जो बर्फी है वह एक लड़की है। नाम है बिट्टी मिश्रा (कृति सेनन)। बिट्टी खुले दिमाग और स्वतंत्र विचारों की लड़की है। कहने का मतलब जैसी पारंपरिक लड़कियां होती हैं वैसी नहीं है। रात को घर से बाहर भी निकल जाती है और अपने हमउम्र लड़कों के साथ मोटर साइकिल पर बैठ पर घूमती भी है। वो सिगरेट भी पीती है। ये बात उसके पिता (पंकज त्रिपाठी) भी ये जानते हैं और इसी कारण वे कभी कभी बिट्टी से मांग कर सिगरेट भी पी लेते हैं। बिट्टी कभी-कभार लड़कों के साथ शराब भी पीती है। वो बिजली विभाग में काम करती है। देखने में स्मार्ट भी है। पर उसकी शादी नहीं हो रही है। उसे देखने लड़के भी आते हैं पर उसे पसंद नहीं करते। इसका बिट्टी की मां (सीमा पाहवा) को अफसोस है। बिट्टी को मां का ये रवैया पसंद नहीं आता इसलिए वो घर से भागने का तय करती है और ट्रेन पकड़ भी लेती है। लेकिन रास्ते में उसे ‘बरेली की बर्फी’ नाम की एक किताब पढ़ने को मिलती है जिसमें उसी जैसी लड़की के बारे में जिक्र है। बिट्टी घर वापस आ जाती है और उस किताब के लेखक प्रीतम विद्रोही (राज कुमार राव) को ढूंढ़ने की कोशिश करती है। उसे लगता है कि कोई तो है जो उसे जानता है और उसका मुरीद है।
पर इस किताब का वास्तविक लेखक प्रीतम विद्रोही नहीं केशव दूबे (आयुष्मान खुराना) नाम का शख्स है जो प्रिंटिंग प्रेस चलाता है। उसने प्रीतम के नाम से किताब लिखी है। किताब चूंकि उसके प्रेस से छपी है इसलिए बिट्टी उसके पास पहुंचती है। वो खुद बिट्टी पर मोहित हो जाता है लेकिन ये नहीं जताता कि किताब का वास्तविक लेखक वही है। फिर केशव बिट्टी के कहने पर प्रीतम को ढूंढ़ने निकलता है और कई तरह की नाटकबाजी करता है। हालात ऐसे बनते हैं कि बिट्टी किसकी हो, प्रीतम की या केशव की-इस पर कई तरह के लफड़े शुरू हो जाते हैं।
फिल्म अपेक्षाकृत छोटे शहरों में उभर रही लड़कियों के भीतर बढ़ते आत्म विश्वास के बारे में है जो परंपरा के दबाव में कसमसा रही हैं। वे पारंपरिकता की बेड़ियों और बंधनों से मुक्त होना चाहती हैं पर रास्ता मिलने में कठिनाई भी महसूस कर रही है। कृति सेनन ने बिट्टी की जो भूमिका निभाई है उसमें बिंदासपन है और साथ ही उन्मुक्तता भी। कृति की भूमिका कंगना रानावत की कुछ भूमिकाओं से मिलती जुलती है। आयुष्मान भी ठीक ठाक हैं लेकिन एक सहमे से और आत्मविश्वासहीन प्रीतम विद्रोही की भूमिका राज कुमार राव ने जो निभाई है उसमें एक खास तरह का आकर्षण है। राव आजकल हर फिल्म में कुछ न कुछ नया करते हैं और इसमें भी किया है। ‘बरेली की बर्फी’ बड़े सितारों की फिल्म भले न हो लेकिन इसमें भारत के छोटे और मझोले शहरों का दिल मौजूद है।
