थलापति विजय की फिल्म ‘जन नायकन’ की रिलीज में बार-बार हो रही देरी ने तमिल-तेलुगु प्रशंसकों को परेशान कर दिया है। 9 जनवरी को रिलीज होने वाली यह फिल्म CBFC की सर्टिफिकेशन प्रक्रिया को पास नहीं कर पाई और मंजूरी के लिए मद्रास उच्च न्यायालय में पहुंची है। इस फिल्म की सेंसरशिप को लेकर बहस तेज हो रही है। इमुद्दे पर अब दिग्गज फिल्ममेकर राम गोपाल वर्मा ने भी खुलकर अपनी राय रखी है। हमेशा बेबाक बयान देने वाले वर्मा ने साफ कहा है कि सेंसर बोर्ड अब पुराने जमाने की सोच है और आज के डिजिटल दौर में इसकी कोई जरूरत नहीं रह गई है।
राम गोपाल वर्मा का कहना है कि आज जब हर उम्र के लोग मोबाइल और इंटरनेट के जरिए कुछ भी देख सकते हैं, तब फिल्मों पर सेंसरशिप करना बेकार है। उन्होंने यहां तक कहा कि सेंसरशिप दर्शकों का अपमान है।
उन्होंने साफ किया कि उनका बयान सिर्फ ‘जन नायकन’ विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी सेंसरशिप व्यवस्था पर है। वर्मा ने कहा कि यह सोचना ही बेवकूफी है कि सेंसर बोर्ड आज भी जरूरी है। इसके लिए उन्होंने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को भी जिम्मेदार ठहराया। X पर लंबी पोस्ट में उन्होंने लिखा,“CBFC का काम बहुत पहले खत्म हो जाना चाहिए था, लेकिन इसकी जरूरत पर बहस करने की आलस की वजह से इसे अब तक जिंदा रखा गया है। इसके लिए पूरी फिल्म इंडस्ट्री जिम्मेदार है।”
राम गोपाल वर्मा ने आज की हकीकत बताते हुए आगे लिखा, “आज एक 12 साल का बच्चा मोबाइल पर आतंकियों की हिंसक वीडियो देख सकता है, 9 साल का बच्चा गलती से पोर्न तक पहुंच सकता है और कोई भी व्यक्ति बिना रोक-टोक दुनिया भर का खतरनाक कंटेंट देख सकता है। वो भी बिना किसी सेंसर और पूरी आजादी के। ऐसे माहौल में अगर सेंसर बोर्ड ये सोचे कि फिल्म में एक शब्द काट देने या सिगरेट को ब्लर कर देने से समाज सुरक्षित हो जाएगा, तो यह मजाक है।”
उन्होंने यह भी बताया कि CBFC उस दौर में बना था, जब तस्वीरें दुर्लभ थीं और मीडिया पर सरकार का पूरा कंट्रोल था। आज के समय में यह तय करना कि लोग क्या देखें या न देखें, बिल्कुल बेकार है। “आज सेंसरशिप किसी को रोकती नहीं, बल्कि दर्शकों की समझ का अपमान करती है। हम यह तय करने के लायक हैं कि देश कौन चलाए, लेकिन यह तय नहीं कर सकते कि क्या देखना है? जो समाज सोशल मीडिया पर हिंसा और गंदा कंटेंट आराम से देख लेता है, वही सिनेमा में कुछ दिखने पर अचानक ‘संस्कृति’ की चिंता करने लगता है। यह पाखंड खतरनाक है।”
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आखिर में वर्मा ने कहा कि सिनेमा का काम लोगों को पढ़ाना नहीं, बल्कि मनोरंजन करना और समाज का आईना दिखाना है। “सरकार का काम फिल्मों को काटना नहीं, बल्कि नागरिकों पर भरोसा करना है। यही अभिव्यक्ति की आज़ादी का असली मतलब है। एज सर्टिफिकेशन ठीक है, कंटेंट को लेकर चेतावनी देना भी ठीक है, लेकिन सेंसरशिप बिल्कुल गलत है।”
राम गोपाल वर्मा का कहना है कि सेंसर बोर्ड अपना असली मकसद बहुत पहले ही खो चुका है, लेकिन अब भी उसे सिर्फ आलस और पुरानी सोच की वजह से जिंदा रखा गया है।
