इस आईपीएस अफसर को उनकी बहादुरी और साहस के लिए जाना जाता है। अपराधियों से बिना डरे लोहा लेने की उनकी अद्भुत क्षमता के सभी लोग कायल हैं। उनकी साहस से प्रभावित होकर दो-दो राज्यों की सरकारों ने उन्हें पुरस्कृत किया था।

हम बात कर रहे हैं साल 2008 बैच के आईपीएस अधिकारी अनीश गुप्ता की। मूल रूप से अनीश गुप्ता पंजाब के रहने वाले हैं। झारखंड के चाईबासा में पुलिस अधीक्षक के पद पर रहते हुए उन्होंने कोल्हान के जंगलों में छिपे खूंखार माओवादी संदीप के आतंक को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म कर दिया था।

जंगल में छिप कर रहने और बड़ी वारदातों को अंजाम देने वाले इस नक्सली का खात्मा अनीश गुप्ता के लिए कतई आसान नहीं था। साल 2017 में अनीश गुप्ता को यह जानकारी मिली थी कि वो अपने कुछ साथियों के साथ फुटबॉल मैच देखने जा रहा था।

जिस गांव में इस मैच का आयोजन किया गया था वो गांव संदीप के समर्थकों से भरा हुआ था। इसके बावजूद अनीश गुप्ता अपनी टीम को लेकर मौके पर पहुंच गए। संदीप की पहचान सुनिश्चित करने के बाद उसके पास पहुंचे और सीधे पिस्टल उसके सिर पर तान दी। अपने नेता को पुलिस के कब्जे में देख दूसरे माओवादियों के हाथ पांव फूल गए। गुप्ता ने उसे गिरफ्तार किया और सीधे उसे साथ लेकर चाईबासा के लिए रवाना हो गए। गुप्ता की बहादुरी के किस्से आज भी कोल्हान के गांव में सुनाए जाते हैं।

अब जरा यह भी जान लीजिए की संदीप कितना बड़ा नक्सली था। सारंडा समेत पूरे कोल्हान क्षेत्र में संदीप दा उर्फ संदीप सोरेन उर्फ मोतीलाल सोरेन की गिरफ्तारी से संबलपुर, देवगढ़, सुंदरगढ़ समेत कई इलाकों में नक्सली गतिविधियों पर लगाम लगा था।

संदीप के पास से यूएस निर्मित 9 एमएम की एक विदेशी पिस्तौल, 9 एमएम की पांच कारतूस तथा उसके निशानदेही पर छह एचई बम (हाई एक्टप्लोसिव बम) बरामद किया गया है। संदीप के खिलाफ 7 हत्याओं समेत कुल 36 मामले दर्ज हैं। 16 जनवरी 2011 को चाईबासा जेल से भागने से पहले संदीप के खिलाफ 17 मामले दर्ज थे। जबकि जेल से भागने के बाद उसके खिलाफ पुलिस ने 19 मामले दर्ज थे।

कहा जाता है कि जिस फुटबॉल टीम का मैच देखने के लिए संदीप पहुंचा था। उस टीम में संदीप के गिरोह के लोग भी शामिल थे। माओवादी नेता संदीप को गिरफ्तार करने के लिए झारखंड सरकार की तरफ से 25,00,000 रुपये तथा पड़ोसी राज्य ओडिशा की तरफ से 20,00,000 रुपये का पुरस्कार स्वीकृत किया गया था।