उमाशंकर सिंह
जनसत्ता 14 अक्तूबर, 2014: कुछ दिन पहले भाजपा के एक सांसद से मुलाकात हो गई। मैंने कहा कि आपकी सरकार तो शानदार चल रही है! बाधा पैदा करने वाली कोई सहयोगी पार्टी भी नहीं है, इसलिए आप लोगों के कामकाज में किसी रुकावट का कोई चक्कर भी नहीं है। मेरी बात ने शायद उनकी किसी दुखती रग को छू लिया। उनका गुबार फूट पड़ा- ‘अरे साहब, हमारा काम क्या खाक मजे में चलेगा। हमारी कोई पूछ ही नहीं है। अच्छा होता कि हम दो सौ अड़सठ ही होते! तब हम एक-एक सांसद का महत्त्व हमारी सरकार को पता होता। अभी तो हालत यह है कि कोई काम लेकर किसी मंत्री के पास जाओ तो सुनता ही नहीं। कहता है कि इसके लिए मोदीजी से पूछना होगा, उनसे इजाजत लेनी पड़ेगी।’ सांसद महोदय बिना रुके बोलते जा रहे थे। कहने लगे कि जीवन मुश्किल होता जा रहा है। क्षेत्र में जाओ तो लोग काम के लिए पूछते हैं। काम यहां हो नहीं रहा। ऊपर से हर सांसद को अपने क्षेत्र में एक आदर्श गांव बनाने की जिम्मेदारी दे दी है। पूरी सांसद निधि भी झोंक दें तो आदर्श गांव नहीं बन सकता। मारामारी यह कि लोग आदर्श गांव के लिए अपने-अपने गांव का नाम देने की कोशिश करने लगे हैं। नहीं मानने पर नाराज होते हैं।
मैंने जानने की कोशिश की कि सबके सामने लॉटरी से तय करने में भी दिक्कत है क्या! उन्होंने कहा कि लॉटरी कौन मानता है! झंझट से बचने के लिए हमने एक गांव का नाम तय कर कह दिया कि मोदीजी ने फाइनल किया है। हम क्यों अपने सिर पर लें, जब हमारे हाथ में कुछ है ही नहीं! लेकिन इसमें भी डर यह है कि अगली बार जब दूसरे गांवों में वोट मांगने जाएंगे तो वहां के लोग ये न कहें कि जाओ जिस गांव को मोदीजी ने फाइनल किया, उसी से वोट मांगो। पांच साल में पांच आदर्श गांव बना भी दें तो सिर्फ पांच गांव के वोट से तो जीतेंगे नहीं! सांसद यह भी मानते हैं कि मोदीजी के दिशा-निर्देश के पीछे मंशा अच्छी है, लेकिन इसके लिए संसाधन कहां से आएगा! अगर सिर्फ सांसद निधि के भरोसे ही करना होगा तो पूरे संसदीय क्षेत्र के दूसरे काम कहां से होंगे! साल में पांच करोड़ रुपए में पांच किलोमीटर लंबी सड़क ही बन सकती है। उन्होंने आगे कहा कि पांच साल बाद सही, चुनाव में तो जाना ही है! पैसा तो चाहिए चुनाव में। भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी पर अंकुश लगे, यह तो ठीक है, लेकिन अपनी राजनीति बचाने के लिए जरूरी है कि क्षेत्र के लोगों के काम तो हों! सिर पर डंडा लटकाने और नीचे तलवार की धार पर चलाने से तो काम नहीं चलेगा न!
उनकी शिकायत उन मंत्रियों से थी जो या तो मोदीजी के प्रभामंडल का इस्तेमाल कर या फिर उनका डर दिखा कर सांसदों के साथ पेश आ रहे हैं। ऐसा नहीं है कि हर बात की खबर रखने वाले मोदीजी को इन बातों की जानकारी नहीं होगी। लेकिन शायद इन सांसदों की सुध लेना फिलहाल उन्हें जरूरी नहीं लगता हो। हालांकि पता चला है, उन्होंने सांसदों को भरोसा दिया है कि अगली बार चुनाव में जाने तक बहुत कुछ हो जाएगा, जिससे बूते वे मतदाताओं के पास जा सकेंगे। एक पत्रकार के तौर पर अभी तक आम लोगों की समस्याओं को सुना करता था। पहली बार एक सांसद की समस्या सुन रहा था। लगा कि जब एक सांसद इतना लाचार महसूस कर रहा है तो वह अपने क्षेत्र की जनता को क्या दे पाएगा! कुल मिला कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस ‘कसावट’ के साथ काम कर रहे हैं, उससे सांसदों के बीच एक गुबार भी पनप रहा है और वह कभी सार्वजनिक तौर पर भी फूट सकता है! आखिरकार किसी सांसद की राजनीति का अपना इलाका बचा रहेगा, तभी तो वह किसी के साथ खड़ा रह सकेगा!
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