वाणिज्यिक बैंकों के नए परिवर्तनीय दर वाले ऋणों को अनिवार्य रूप से बाहरी मानकों पर आधारित करने के भारतीय रिजर्व बैंक के आदेश से बैंकों की वित्तीय चुनौतियां बढेंगी। मूडीज इन्वेस्टर सर्विस ने यह राय जताई है। बैंकों को एक अक्टूबर से अपने फ्लोटिंग दर वाले कर्ज को बाहरी बेंचमार्क से अनिवार्य रूप से जोड़ना है। पिछले सप्ताह रिजर्व बैंक ने कहा था कि बैंक नीतिगत दरों में कटौती का लाभ संतोषजनक तरीके से उपभोक्ताओं को स्थानांतरित नहीं कर रहे हैं। केंद्रीय बैंक ने बैंकों से अनिवार्य रूप से अपने सभी व्यक्तिगत और खुदरा ऋणों तथा सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) को दिए जाने वाले फ्लोटिंग दर वाले कर्जों को बाहरी बेंचमार्क से जोड़ने को कहा था।
रिजर्व बैंक ने इस साल नीतिगत दर यानी रेपो दर में 1.10 प्रतिशत की कटौती की है। वहीं बैंकों ने इसके थोडा लाभ ही उपभोक्ताओं तक स्थानांतरित किया है।
मूडीज ने कहा कि यह देश के बैंकों की साख की दृष्टि से उचित नहीं है। इससे उनकी ब्याज दर से जुड़े जोखिम के प्रबंधन की क्षमता और लचीलापन प्रभावित होगा। यह बाहरी बेंचमार्क दर रेपो रेट, तीन महीने या छह महीने का ट्रेजरी बिल या फाइनेंशियल बेंचमार्क इंडिया प्राइवेट लि. द्वारा प्रकाशित कोई अन्य बेंचमार्क बाजार ब्याज दर हो सकती है।
वहीं दूसरी ओर भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने आगामी त्योहारी मौसम पर नजर रखते हुये विभिन्न अवधि के कर्ज की ब्याज दर में 0.10 प्रतिशत की और कटौती की घोषणा की है। यह कटौती मंगलवार से प्रभावी हुई। इसके साथ ही चालू वित्त वर्ष में बैंक अब तक ब्याज दर में पांच बार में कुल 0.40 प्रतिशत की कटौती कर चुका है। बैंक ने इसके साथ ही अपनी खुदरा और थोक सावधि जमा दरों में भी 0.10 प्रतिशत से लेकर 0.25 प्रतिशत तक की कटौती की घोषणा की है। बैंक ने कहा है कि इस कटौती के बाद उसकी सीमांत लागत आधारित कर्ज की ब्याज दर (एमसीएलआर) 8.25 प्रतिशत से कम होकर 8.15 प्रतिशत रह जायेगी। बैंक के सभी अवधि के कर्ज की ब्याज दरें इसी के आधार पर तय होतीं हैं।
