Investment Strategy : हम अक्सर यह मानकर चलते हैं कि अगर हमारी बचत हर साल बढ़ रही है तो हमारा भविष्य सुरक्षित है। फिक्स्ड डिपॉजिट, गोल्ड, म्यूचुअल फंड या शेयर्स में निवेश की गई रकम बढ़ती रहे तो लगता है हमारी इनवेस्टमेंट जर्नी सही दिशा में आगे बढ़ रही है। लेकिन एक ऐसी सच्चाई है, जिस पर बहुत कम लोग ध्यान देते हैं। डॉलर के मुकाबले रुपये की वैल्यू समय के साथ लगातार कमजोर होती रही है। आंकड़े बताते हैं कि भारतीय रुपया हर 10 साल में डॉलर के मुकाबले करीब 40% तक कमजोर होता रहा है। इसका सीधा असर आपकी जमापूंजी की असल परचेजिंग पावर पर पड़ता है।

आपकी बचत को कैसे खाती है रुपये की कमजोरी 

मान लीजिए आज आपके पास 10 लाख रुपये हैं और 10 साल बाद यह रकम 18 लाख रुपये हो जाती है। कागज पर यह अच्छा रिटर्न लगता है। लेकिन अगर उसी दौरान रुपया कमजोर होकर अपनी वैल्यू का बड़ा हिस्सा खो देता है, तो आपकी परचेजिंग पावर यानी खरीदने की ताकत उतनी नहीं रह जाती। विदेश में पढ़ाई, इलाज, ट्रैवल या कोई भी इम्पोर्टेड सामान पहले से कहीं ज्यादा महंगा हो जाता है। यानी पैसा बढ़ने के बावजूद आप कम चीजें खरीद पाते हैं।

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यह सिर्फ करेंसी का मसला नहीं, पोर्टफोलियो का भी मसला है

यह सिर्फ करेंसी का नहीं, पोर्टफोलियो का भी मसला है। यानी यह समस्या सिर्फ रुपये में गिरावट तक सीमित नहीं है। मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स ने अपने एक ताजा नोट में कहा है कि असली दिक्कत पूरी बचत और निवेश के सिर्फ एक ही करेंसी पर निर्भर होने की वजह से हो सकती है। ऐसे पोर्टफोलियो पर भारतीय अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव का असर बहुत अधिक होता है। इस नोट के मुताबिक लंबे समय के आंकड़े बताते हैं कि भारत के साथ-साथ ग्लोबल इक्विटी को पोर्टफोलियो में शामिल करने से रिस्क कम हुआ है और रिटर्न ज्यादा स्टेबल हुए हैं।

ग्लोबल इनवेस्टमेंट अब मुश्किल नहीं

कुछ साल पहले तक विदेश में निवेश करना जटिल, महंगा और टैक्स के लिहाज से मुश्किल माना जाता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। गिफ्ट सिटी (GIFT City) जैसे प्लेटफॉर्म, लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत आसान नियम, ग्लोबल इनवेस्टमेंट पर कम लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स और बेहतर रेगुलेशन ने रास्ता आसान कर दिया है। यही वजह है कि आज भारतीय निवेशकों के लिए ग्लोबल इनवेस्टमेंट पहले से कहीं ज्यादा प्रैक्टिकल हो गया है।

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ग्लोबल एक्सपोजर का मतलब शॉर्ट टर्म दांव नहीं

मार्सेलस ने अपने नोट में साफ किया है कि विदेश में निवेश का मतलब विदेशी बाजारों में सट्टा लगाना नहीं है। इसका मकसद है रुपये की गिरावट से बचाव, पोर्टफोलियो को मजबूत बनाना और भविष्य की जरूरतों के हिसाब से निवेश को ढालना। जरूरी नहीं कि पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा बाहर लगाया जाए। थोड़ा बहुत ग्लोबल एक्सपोजर भी लंबे समय में आपकी दौलत की वैल्यू को बचाने में मददगार साबित हो सकता है।

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समय के साथ निवेश की सोच बदलना जरूरी

आज भारतीय परिवार पहले से ज्यादा ग्लोबल हो चुके हैं। बच्चे विदेश में पढ़ना चाहते हैं, इलाज और लाइफस्टाइल की जरूरतें भी बदल रही हैं। ऐसे में निवेश की रणनीति में भी इस नए ग्लोबल नजरिये को शामिल करना जरूरी है। सिर्फ रुपये में बढ़ती रकम को देखकर खुश रहना अब काफी नहीं।