सात दशक पहले जब भारत को आजादी मिली तो बहुत से लोग इसे लेकर सशंकित थे। उनमें से एक थे विंस्टन चर्चिल। चर्चिल ने भारत को आजादी देने का पुरजोर विरोध किया था। उनका तर्क था कि भारत आजादी को संभालने के काबिल नहीं हैं। उनका प्रसिद्ध कथन है, “अगर भारत को आजादी दी गई तो सत्ता की बागडोर दुष्टों, ठगों और लुटेरों के हाथ में चली जाएगी; भारतीय नेताओं की क्षमता कमतर है…वो सत्ता के लिए आपस में लड़ पड़ेंगे और भारत राजनीतिक तकरार में फंस जाएगा। एक दिन ऐसा आएगा कि भारत में पानी और हवा पर भी टैक्स लगा दिया जाएगा।”

चर्चिल ने जिन चीजों को लेकर आशंका जताई थी उनमें से ज्यादातर हमारे देश में नहीं हैं और जो हैं वो उतनी ही ब्रिटेन या किसी दूसरे लोकतांत्रित देश में भी मौजूद हैं। हम “दुष्ट, ठग, लुटरे” नहीं हैं, न ही ब्रिटेन के लोग हैं। हमने आजादी के बाद हमने लोकतंत्र की ब्रिटिश वेस्टमिंस्टर व्यवस्था को चुना। लोकतंत्र अपने मूल स्वभाव में ही शोरगुल वाली राजनीति है। महात्मा गांधी तक ने इसकी आशंका जताई थी कि हम जिस लोकतंत्र को हस्तगत कर रहे हैं उसके भीड़तंत्र में बदलने का भय है। महात्मा गांधी ने चेतावनी देते हुए कहा था, “शिक्षा, अनुशासन, कानून के समक्ष सभी की समानता और व्यक्तिगत के ऊपर सामाजिक को तरजीह दिए बिना लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता।” उन्होंने साफ कहा था कि भीड़ के पास “बुद्धि और विवेक नहीं होता।”

गांधीजी सदैव राम राज्य की बात किया करते थे। राम राज्य से उनका आशय एक ऐसे समाज से था जिसमें राजा से रंक तक कानून का पालन करें, राजनीति कुछ चुने हुए लोगों की सनक के बजाय सामाजिक कल्याण की भावना से संचालित हो और जनता शिक्षित और अनुशासित ढंग से व्यवहार करें।

पिछले सात दशकों में हमने इनमें से ज्यादातर चीजों का अनुभव किया है। हमने अपने गरीब जनता को अशिक्षित और पिछड़ा रहने दिया और लोकतंत्र के नाम पर कुलीनतंत्र चलाते रहे। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जैसे प्रखर लोकतांत्रिक नेता भी लोकतंत्र को “दूसरी सबसे अच्छी व्यवस्था” बताते रहे। सबसे अच्छी? वो कहते, “उसका अभी आविष्कार किया जाना है।” नेहरू ने लिखा है, “लोकतंत्र अच्छा है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि बाकी व्यवस्थाएं उससे बुरी हैं। लेकिन ये कहना कि लोकतंत्र से सारी समस्याएं हल हो जाएंगी पूरी तरह गलत है। समस्याओं का समाधान बुद्धिमत्ता और कठिन परिश्रम से होता है।” गांधीजी के उलट नेहरू मानते थे कि कुछ लोगों की बुद्धिमत्ता से लोकतंत्र प्रभावी बनाया जा सकता है, जबकि गांधीजी एक मूल्य आधारित समाज चाहते थे।

पिछले सात दशकों में भारतीय समाज परिपक्व हो चुका है। कई मायनों में हमें कई बुनियादी अधिकारों को समझने और सही से लागू करने में सात दशक लग गए। पहली चीज जिसे सही से लागू किया गया वो अरस्तू की कही हुई है। अरस्तू ने कहा था, “लोकतंत्र वही है जहां निर्धन का शासन हो न कि धनिकों का।” इस संदर्भ में निर्धन ऐसे व्यक्ति को समझना चाहिए जिसने साधारण भारतीय के जीवन को देखा और जिया हो। भारत को ऐसा नेता का नेतृत्व पाने में सात दशक लग गए जो मुंह में चांदी का चम्मच लेकर नहीं पैदा हुआ था।

देश के मौजूदा नेतृत्व की सोच अलग है। रिफॉर्म (सुधार) उसका एजेंडा नहीं, उसका दृष्टिकोण ट्ऱॉन्सफॉर्मेशन (परिवर्तन) है। रिफॉर्म मौजूदा सिस्टम की ऊपरी मरम्मत करना है। ट्रॉन्सफॉर्मेशन जमीनी बदलाव करना है। रिफॉर्म सरकार का काम है। लेकिन ट्रॉन्सफॉर्मेशन के लिए जन-भागीदारी की जरूरत होती है। अब तक जनता से कहा जाता रहा कि हर पांच साल बाद वोट देने से उसकी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है लेकिन देश का नया नेतृत्व जनता द्वारा संचालित सरकार की अवधारणा में यकीन रखता है।

नरेंद्र मोदी ने लाल किले से कहा- नगला फतेला में 70 साल बाद पहुंचाई बिजली, गांववाले बोले- दावा झूठा

भारत को 70 साल और एक परिवर्तनकारी एजेंडे के बाद ये महसूस हुआ कि हमें स्वच्छ रहना है। दुनिया के सबसे बेहतर स्थानों में एक होने के बावजूद एक चीज हमारे देश के खिलाफ चली गई, वो है स्वच्छता का अभाव। आज सरकार के परिवर्तनकारी एजेंडे के कारण स्वच्छ भारत जन-अभियान में बदल चुका है।

70 सालों तक हम महिलाओं के संग दुर्व्यवहार से निपटने की कोशिश करते रहे। भारतीय प्रधानमंत्री ने लाल किले से दिए अपने पहले संबोधन में लोगों से महिलाओं को सम्मान और आजादी देने की अपील की। शौचालय का निर्माण केवल स्वच्छता से जुड़ा मामला नहीं है। ये महिलाओं के सम्मान, हिंसा से उनकी रक्षा, उनके शैक्षणिक उत्थान और सशक्तिकरण से जुड़ा विषय है। लड़कियों के बीच में पढ़ाई छोड़ देने के पीछे एक कारण स्कूलों में शौचालय का अभाव भी माना जाता है। आज शौचालय का निर्माण राष्ट्रीय मुहिम बन चुका है।

हमें जन धन योजना के माध्यम से सड़क के आखिरी आदमी को देश के अर्थतंत्र में शामिल करने में 70 साल लग गए। आज झुग्गियों, रेलवे प्लेटफॉर्म, फ्लाईओवरों के नीचे रहने वाले लोग भी सुरक्षित हैं, उनके पास बीमा सुरक्षा है। सात दशकों तक एससी/एसटी अस्मिता की राजनीति के बाद अब जाकर हमने महसूस किया है कि उनकी असली जरूरत केवल आरक्षण नहीं है, बल्कि सम्मान है; ये केवल कुछ नई नौकरियों का मसला नहीं बल्कि निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी का सवाल है। आज हम “युवा नेतृत्व वाले विकास” की बात कर रहे हैं। अब हम केवल युवाओं के लिए रोजगार के बारे में नहीं सोच रहे. विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत कई युवा रोजगार-दाता बनने के लिए प्रेरित हुए हैं।

लेकिन आजादी के सात दशकों बाद भी कई मुद्दे आज भी अनसुलझे हैं। असहिष्णुता की बहस, सेकुलर-कम्यूनल की बहस और राष्ट्रवाद की बहस ऐसे ही कुछ मुद्दे हैं। इनसे हमारे देश की एकता को अपूर्णनीय क्षति पहुंची है और इनसे हमारी राष्ट्रीय संभावनाओं पर असर पड़ा है। ज्यादातर मौकों पर दोनों पक्षों के विमर्श त्रुटिपूर्ण रहे हैं। जो लोग सहिष्णुता का सवाल उठाते हैं वो खुद उनकी बात न मानने के कारण संस्थानों से इस्तीफा देकर अपनी असहिष्णुता का परिचय देते हैं। जब हम भारतीय समाज से छुआछूत की बुरी प्रथा को काफी हद तक समाप्त कर चुके हैं, ऐसे में हम वैचारिक छुआछूत की नई अस्वीकार्य प्रथा को पनपते देख रहे हैं।

विपरित विचारों का स्वीकार करना परिपक्व समाज का लक्षण है। अति-प्राचीन काल से ही इस देश में आचार-विचार की बहुलता को स्वीकार करने और सराहने की परंपरा रही है। हाल ही में हुई युवाओं चिंतकों की एक बैठक में मैंने कहा, “वैचारिक खुलापन बरकरार रखें, टकराने की जगह समायोजित करें, अपने विचारों पर दृढ़ रहते हुए दूसरों के विचारों को भी जगह दें, हर दूसरे विचार को सांप्रदायिक या राष्ट्र-विरोधी कहकर उसकी निंदा करने के बजाय उनका बौद्धिक मुकाबला करें, और सबसे ऊपर ये ध्यान रखें कि विचारों और अवधारणों की बहुलता में ही जीवन की सच्चाई और सुंदरता है।” और जो गांधीजी ने कहा था उसे याद रखें, “केंद्र में बैठे हुए 20 लोगों से लोकतंत्र नहीं आ सकता।”

लेखक बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव हैं और इंडिया फाउंडेशन के निदेशक हैं।

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