सांत्वना श्रीकांत

अगर तुम सुन लेते

वह सिर्फ-
बात करना चाहती थी
दूर तक पसरे
सन्नाटे के बारे में,
सन्नाटे में अठखेलियों
की आवाज के विषय में,
घुप अंधेरों से आती
रोशनी के पुंज के बारे में।

वह सिर्फ-
बात करना चाहती थी,
तुम्हारे चेहरे के
भावों का लेखा
बताना चाहती थी,
प्रेम में पड़ने के बाद
कैसा महसूस होता है
यह भी बतलाना चाहती थी।
और पहली बार तुम्हें
मुस्कुराते देख कर
कैसे शर्माई थी यह भी,
ये सारी बातें-
तुमको बताना चाहती थी।

वह सिर्फ-
बात करना चाहती थी।
तुम्हें देखने के लिए
कैसे वो सदियां
बीता सकती है,
तुम्हारी छुअन को उसने
कितने जतन से संजोया है,
इन सबका अनुभव
तुम्हें देना चाहती थी,

वह सिर्फ-
बात करना चाहती थी,
अगर तुम सुन लेते।

मेरी शून्यता का अनंत

मैंने कई बार
तुम्हें बताने की
यह कोशिश की-
कुछ और नहीं मेरे पास,
तुम्हारे होने के सिवा।

और तुम हो कि
मानते ही नहीं,
कि तुम कहीं
खुद के कर्जदार
न हो जाओ।

आखिरी बार गले लग कर
जो तुम अपने आप को
मेरे पास छोड़ गए हो न,
उससे मेरी शून्यता को
अनंत मिल गया है।