सांत्वना श्रीकांत
1. अशेष आकांक्षाएं
आंखों में भर उम्मीदें
निहारू जब तुमको,
नील जैसा छिटक देना
अनंत अभिलाषाएं,
जब भर आए
मेरी आंखों में आंसू
धरा सदृश थाम लेना
अपने अंक में,
बांहें फैलाऊं जब
सागर जैसा समा लेना
तुम स्वयं में
कर लेना आलिंगन
कान्हा बन कर,
मां जैसा संबल देना
पिता जैसा आशीष देना
साथी यही है
अशेष आकांक्षाएं!!!
2.
जब चारदीवारी में
बंद रोशनियां
बेचैन होती हैं
अंधेरे को
गले लगाने के लिए
तब मैं भी
तुम्हारी उदासियों में
इंद्रधनुष रचने को
आतुर होती हूं
और चूम कर
तुम्हारे ललाट पर
उगा देना चाहती हूं
उम्मीदों का सूरज,
साथी यही है
अशेष आकांक्षाएं!!!

