– डॉ. सांत्वना श्रीकांत
शून्य है सब कुछ
कोई अभिव्यक्ति नहीं
मार रहा आदमी को आदमी,
न मार सका तो
मार रहा विषाणु से ही।
विचारों की मौत हो रही
खत्म हो रही देह भी,
खो बैठा है संतुलन
व्यवहार भी है विकृत
कभी अट्टहास करता
तो कभी कोने में छुप
बुदबुदाता है आदमी
भीतर सहमा है इंसान
बाहर क्यों आता नहीं आदमी।
कितना हैवान हो गया वह
गंभीर मुद्रा में स्वयं का
अहम छुपाता है आदमी
अंधी दौड़ में शामिल,
हार जाने के डर से
हर किसी पर हावी होने की
कोशिश में रहता आदमी,
सचमुच आत्ममुग्धता में
कितना गुम हो गया आदमी।

