-डॉ सांत्वना श्रीकांत

नदी जैसी हो तुम
और मैं उसमें
मिश्रित रेत की तरह,
चमकता हूं हर पल
तुम्हारी सपनीली आंखों में
उसने कहा था एक दिन।
तुम जननी मेरी
मैं तुम्हारा उपज
यदि नहीं करूंगा
इंतजार तो कौन समझेगा
हमारे रिश्ते को
कौन समझेगा तुम्हें नदी
और मुझे तटबंध?
पड़ा रहता हूं अविचल
तुम्हारे पीले आंचल में
चांदी की रेत लेकर
ताकि लहरों पर इठलाती
तुम आओ बार-बार
और करो अपना शृंगार,
मैं तुम्हें ताकता रहूं अपलक
भर लूं तुम्हें आंखों में
ताकि बचा लूं
दुनिया के लिए पानी,
उसने कहा था एक दिन,
नदी जैसी हो तुम।