सांत्वना श्रीकांत
बुद्ध की प्रतीक्षा
तुम्हारा-
कानों के पीछे चूमना
आत्मा को छूना है जैसे,
होठों को चूमना
सूर्य की रश्मियों को
रास्ता देना था।
मेरी देह में
उतर रहे हो तुम
रक्त कणिकाओं की तरह,
असं•ाव सा लग रहा
रक्त कणिकाओं के बिना
देह का भविष्य।
सदी की महत्त्वपूर्ण
है यह घटना,
जिसकी साक्षी है
ये छुअन
जो अंकित है
तुम्हारे हृदय में,
धड़कती रहेगी यह
सदी के अंत तक
बुद्ध की प्रतीक्षा में…..।
2. तुम्हारी उष्मा में…
तुम ने गले लगाया
मानो उड़ेल दिया
उम्र का सुकून
कुछ कहने-सुनने के
खत्म हो गए मायने।
जन्म ले रही थी
प्रेम की नई परिभाषाएं।
मैं जागती हूं तो
मेरे होंठ खोजते हैं
तुम्हारा चुंबन,
नींद में-
मेरी रूह करती है
तुमसे आलिंगन,
मेरी देह की गर्मी में
मिल गई है तुम्हारी उष्मा
यह उष्मा-
मेरे मन में उगते सूर्य की है।

