सांत्वना श्रीकांत
तुम्हारी खोज में
शताब्दियों से मैंने पढ़ी हैं
हड़प्पा से लेकर मेसोपोटामिया
तक की लिपियां,
मिट्टी के ठीकरों पर उत्खनित
अवशेषों को भी
बहुत ध्यान से देखा है,
रोसेत्ता शिलाखंड और
धोलाविरा की शिला पट्टिका का भी
उद्वाचन किया है,
समस्त उवाच शब्दों को
उच्चरित करने में प्रयासरत हूं
पशुपति और मदर गॉडेस
के सामने सिर झुका कर
घुटने के बल बैठी हूं
सिंधु और दजला फरात में
जी भर कर डुबकी लगा कर
उपासना की है
यह समस्त प्रक्रिया मैंने
तुम्हारी खोज में की है।
कहीं नहीं जाता प्रेम
प्रेम कहीं जाता नहीं
वह रह जाता है
कहीं किसी रूप में
स्वप्न बन कर या यथार्थ,
अनुपस्थिति या उपस्थिति
दोनों में ही होता है,
बदल जाते हैं उसके सर्वनाम।
पतझड़ को बसंत के
इंतजार में प्रेम होता है
तो मृत्यु को मोक्ष से
देह को आत्मा से
और प्रेम का रह जाना
इस बात का प्रमाण है कि
यह सदियों से
चला आ रहा था अनवरत।

