डॉ. सांत्वना श्रीकांत
तुमसे उद्भव मेरा
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मैंने तुम से प्रेम किया
बैचैन हुई, नींद त्यागी,
तुम्हें जो पसंद था,
उसे पसंद किया,
आखिर में मेरे पास
कुछ नहीं बचा मेरा।
और तुम हमेशा
इस प्रायश्चित में रहे
कि मुझे तुमसे प्रेम नहीं!
मैं जब कभी मूंदती हूं आंखें,
मेरा माथा चूमते हुए
दिखाई देते हो तुम,
बांहों में लेकर सुनाते हो
धरती की लोरियां,
हालांकि
वास्तविकता यह नहीं है।
तुम ब्रह्मांड हो
जहां से हुआ उद्भव मेरा,
हम दोनों के लिए
प्रेम के मायने
इतने अलग हैं
जैसे-
मेरे मौन में तुम्हारा होना
मेरे हर खयाल की
शुरुआत और अंत का
तुमसे होकर गुजरना।
यहां तक कि
प्रेम का पर्याय तुम हो।
तुम्हारे लिए प्रेम का
प्रारब्ध देह है
इसलिए अब मैं
इस प्रेम से विदा लेती हूं
और स्वयं से भी।

