दूब की नोक पर
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धरती और अंबर
के बीच मिलना
यूं तुम्हारा हमसे
जिजीविषा की आंच में
स्थायित्व का पकना है।
तुम्हारे चुंबन में अंकित हैं
क्षितिज की सारी रूपरेखाएं
जो उतर आती हैं
मेरे माथे पर,
मेरी हथेलियों पर।
दूब की नोक पर
उतरी ओस की बूंद
साक्षी है उस समय की
जब सौंप दिया था
मैंने स्वयं को तुम्हें,
संभाले रखना मुझे
बूंदों से सपनों का
इंद्रधनुष बनने तक।
अप्राप्य का सुख
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मैंने प्रेम होने का इतिहास
दर्ज कर दिया है
तुम्हारे माथे पर,
दंतकथाओं के साक्ष्य भी
कर दिए हैं समर्पित तुम्हें,
तुम्हारे स्वयं में होने के
मायने कर दिए हैं लिपिबद्ध।
अंकित कर दिया है
अपने वर्तमान और
भविष्य में तुम्हें…
ताकि सदियों तक
जीवित रहे-
अप्राप्य का सुख।
-सांत्वना श्रीकांत

