– राकेश धर द्विवेदी

हमेशा मानव सभ्यताओं का विकास
नदियों के तट पर हुआ
शायद नदी यह समझती थी
कि उसके बलिदान से ही
असभ्य मानव सभ्य हो सकता है।
धीरे धीरे असभ्य मानव
अविकसित से अर्द्धविकसित और
पुन: विकसित होता चला गया
विकास के इस क्रम में नदी ने
समर्पित कर दिया अपना
यौवन और अपना वर्चस्व,
कभी बिजली उत्पादन के लिए
कभी सिंचाई के वास्ते
आज जब विकसित मानव
मंगल पर जीवन की तलाश में है
और नदी हाशिए पर आ गई है
तब उसके तमाम पुत्र
लिख रहे हैं उसके
देवत्व की गाथाएं
अनेक काव्य ग्रंथों में
शोध प्रबंधों में, चलचित्रों में
और हाथ जोड़ कर
जीर्ण-शीर्ण नदी को
समझा रहे हैं-
मां आप तो पति पावनी हो
विकास का हलाहल हो तो
आपको ही पीना पड़ेगा।
शायद वे नहीं जानते कि
विकास की इस अंधी दौड़ में
समाप्त हो जाएंगे
नदी-पोखर व तालाब,
तब दूर दूर तक
फैले दिखेंगे बियावान रेगिस्तान
जिसमें कहीं किसी कोने पर
होगी खारे पानी की झील
जिसमें ताखों वर्ष बाद आएंगे
पुरातत्वविद् प्रेमी युगल
जो अनुसंधान के बाद
बताएंगे कि
लाखों वर्ष पूर्व यहां
मानव सभ्यता थी और
बहती थी कोई नदी
जिसने बहाए होंगे आंसू
और आंसुओं से बनी होगी
खारे पानी की ये झील।