डॉ. सांत्वना श्रीकांत
ये सिर्फ तुम हो
मैं तुम्हें शब्दों में
नहीं समेट सकती,
एक आकार ले चुके हो तुम
उस ब्रह्म का-
जिसे मैं हमेशा से पाना चाहती हूं,
समझा नहीं पाती तुम्हें
कि-
अपने स्वप्न को छोड़ कर
यथार्थ जीने का द्वंद्व
सच में कितना भयावह है।
नकार भी देती हूं
सामाजिकता और सांसारिकता,
आस्तिक से नास्तिक की ओर
करवट लेती हूं,
फिर भी-
मैं तुम्हारा आकार नहीं ले पाती।
वृहद या सूक्ष्म होकर तुम
सागर बनते हो तो कभी सूर्य,
कभी बुद्ध तो कभी शिव।
और हां,
कभी-कभी तो
हवा बन चलते हो साथ,
सहला देते हो मेरे गाल,
ये सिर्फ तुम हो।
तब अनायास ही मैं
अंकुरित हो जाती हूं
तुम में वृक्ष बन जाती हूं।
मेरी जड़ें छितरी हैं
तुम्हारी धमनियों तक।
तुम्हारा होना ही प्रेम की
निष्कलंक परिभाषा है,
जिसे गढ़ा है तुमने
और जिसे जीती हूं
मैं खुद में हर पल।

