एटॉमिक हैबिट्स: नया साल शुरू होते ही हम ढेरों संकल्प लेते हैं। कोई तय करता है कि अब रोज़ जिम जाएगा, कोई हर दिन किताब पढ़ेगा, कोई सिगरेट छोड़ने की कसम खाता है, तो कोई मन लगाकर परीक्षा की तैयारी करने का वादा करता है। शुरुआत जोश से होती है और कुछ दिन तक हम अपने लक्ष्य पर टिके भी रहते हैं, लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजरते हैं, वही पुरानी आदतें वापस लौट आती हैं। हर साल 1 जनवरी को मैं भी वही लिस्ट बनाती थी… और फरवरी आते-आते वही लिस्ट दराज में बंद मिलती थी।
मशहूर लेखक जेम्स क्लियर अपनी किताब ‘एटॉमिक हैबिट्स’ में इसी सवाल का जवाब देते हैं कि आखिर हम नई आदतों को लगातार क्यों नहीं निभा पाते। साथ ही, वह यह भी बताते हैं कि कौन-सा तरीका अपनाकर अच्छी आदतों को लंबे समय तक ज़िंदा रखा जा सकता है। इस किताब को पढ़कर मैंने खुद इन बातों को अपनी ज़िंदगी में आज़माया है। आगे आपको बताऊंगी कि इस किताब ने मेरी सोच और आदतों पर क्या असर डाला। साथ ही जानेंगे कि क्यों मोटिवेशन खत्म हो जाता है लेकिन सिस्टम काम करता है।
एटॉमिक हैबिट्स का कॉन्सेप्ट
इस किताब का मूल विचार बहुत सीधा लेकिन बेहद प्रभावशाली है-
“ज़िंदगी में बड़े बदलाव एक दिन में लिए गए बड़े फैसलों से नहीं, बल्कि रोज़ की गई छोटी-छोटी आदतों से आते हैं।”
हम अक्सर जोश में आकर बड़े संकल्प ले लेते हैं, लेकिन जेम्स क्लियर साफ कहते हैं कि आपको हर दिन सिर्फ़ अपने आप से एक प्रतिशत बेहतर बनना है। अगर आप रोज़ थोड़ा-सा भी बेहतर बनने की कोशिश करते हैं, तो समय के साथ उसका असर चमत्कारी हो जाता है। यही है उनका मशहूर एक प्रतिशत नियम।

लक्ष्य से ज़्यादा ज़रूरी होती हैं आदतें
जेम्स क्लियर के अनुसार, आप रोज़ जो करते हैं वही धीरे-धीरे आपकी पहचान बन जाता है। अगर आप सिर्फ़ यह सोचते हैं कि “मुझे रोज़ जिम जाना है”, तो आपका ध्यान एक काम पर रहता है। लेकिन अगर आप यह पहचान बना लेते हैं कि “मैं एक सेहतमंद जीवन जीने वाला इंसान हूं”, तो फिर अपने आप आपके चुनाव बदलने लगते हैं-आप अच्छा खाते हैं, व्यायाम करते हैं और अपनी सेहत का ध्यान रखते हैं।
यानि असली बदलाव लक्ष्य तय करने से नहीं, बल्कि अपनी पहचान पर काम करने से आता है। जब पहचान बदलती है, तो नतीजे अपने आप मिलने लगते हैं।
आदतें विल पॉवर से नहीं, सिस्टम से बनती हैं
जेम्स क्लियर कहते हैं कि आदतें विल पॉवर का खेल नहीं हैं, बल्कि सही सिस्टम बनाने का नतीजा होती हैं। इच्छाशक्ति से आप शुरुआत तो कर सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक हर दिन प्रेरित रहना मुमकिन नहीं है। हमारा दिमाग स्वाभाविक रूप से आराम और कंफर्ट ज़ोन की ओर झुकता है।
यही वजह है कि जब आप डाइट शुरू करते हैं तो ज्यादा भूख लगती है, और जब जिम जाते हैं तो थकान ज्यादा महसूस होती है। दिमाग किसी भी नई आदत को खतरे की तरह देखता है। लेकिन अगर आप शुरुआती मुश्किल दौर पार कर लेते हैं, तो दिमाग उस आदत को अपना लेता है। धीरे-धीरे वही आदत आपकी रोज़मर्रा की व्यवस्था बन जाती है।
इसी शुरुआती दौर को पार करने के लिए जेम्स क्लियर एटॉमिक हैबिट्स में चार नियम बताते हैं।
पहला नियम: आदत को साफ़-साफ़ दिखाइए
अच्छी आदतें आंखों के सामने होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, अगर आप सुबह जिम जाना चाहते हैं, तो रात को ही अपना जिम बैग तैयार करके कमरे में ऐसी जगह रखें जहां उठते ही वह दिख जाए। अगर सोने से पहले पढ़ना चाहते हैं, तो किताब तकिए के पास या साइड टेबल पर रखें। ज्यादा पानी पीना चाहते हैं, तो पानी की बोतल हमेशा मेज़ पर रखें।
इसके उलट, अगर कोई बुरी आदत छोड़नी है, तो उसे आंखों से और पहुंच से दूर कर दीजिए। सिगरेट नहीं पीनी तो उसे पास में न रखें। काम करते समय मोबाइल चलाने की आदत है, तो मोबाइल दूसरे कमरे में रख दें।
जेम्स क्लियर बताते हैं कि जब उन्हें पूरा ध्यान लगाकर काम करना होता है, तो वह अपना फोन किसी और से लॉक करवा देते हैं, ताकि काम पूरा होने तक वह फोन इस्तेमाल न कर सकें।
मैंने भी इस नियम को अपनाया। मुझे भगवद गीता पढ़नी थी। मोबाइल उठाते ही इंस्टाग्राम की नोटिफिकेंशंस ध्यान भटका देती थीं। मैंने फोन से एप्स हटाकर सिर्फ लैपटॉप पर इनका इस्तेमाल करना शुरू किया। नतीजा यह हुआ कि आदतन जब मैं फोन उठाती और वहां कुछ नहीं मिलता, तो मैं गीता पढ़ने लगती। इसी तरह मैंने पूरी गीता पढ़ ली।
दूसरा नियम: आदत को आकर्षक बनाइए
दिमाग वही काम करना चाहता है जो उसे अच्छा लगे। इसलिए शुरुआत उन्हीं चीज़ों से करें जिनमें आपकी रुचि हो। अगर आपको भारी-भरकम किताबें पढ़ना पसंद नहीं तो आप कहानी या कविता की किताबें पढ़िए। जिम के लिए अच्छे जूते, पसंदीदा म्यूजिक या अच्छी सी पानी की बोतल जैसी चीज़ें रखें, ताकि व्यायाम आपको बोझ न लगे।
अगर टहलना बोरिंग लगता है, तो उस दौरान अपना पसंदीदा गाने या पॉडकास्ट सुनिए। मैंने भी यही तरीका अपनाया और एक महीने में दो-तीन किताबें पढ़ लेती हूं। अब मैं व्यायाम करते समय गानों की जगह ऑडियो बुक्स सुनती हूं। और सुंदर बुक मार्क्स खरीदे हैं।
तीसरा नियम: आदत को आसान रखिए
जेम्स क्लियर कहते हैं कि अगर आदत मुश्किल होगी, तो वह जल्दी छूट जाएगी। इसलिए उसे जितना हो सके आसान बनाइए। अगर जिम जाना भारी लगता है, तो खुद से कहिए कि सिर्फ़ दस मिनट ही व्यायाम करेंगे। ध्यान लगाना मुश्किल लगता है, तो आधा घंटा नहीं, सिर्फ़ एक मिनट से शुरुआत कीजिए। किताब पढ़ना कठिन लगता है, तो बस एक पन्ना या एक पैराग्राफ पढ़िए।
शुरुआत में लक्ष्य बड़ा नहीं, बस आदत डालना होना चाहिए। जब आदत जीवन का हिस्सा बन जाती है, तो दस मिनट कब एक घंटे में बदल जाते हैं, इसका पता ही नहीं चलता।
जैसे अच्छी आदतों को आसान बनाना ज़रूरी है, वैसे ही बुरी आदतें छोड़ने के लिए उन्हें मुश्किल बनाना चाहिए। जेम्स क्लियर यह भी कहते हैं कि बुरी आदतें अक्सर उन लोगों से दूरी बनाकर आसानी से छूट जाती हैं, जिनके साथ रहकर आप वह आदत ज्यादा करते हैं।
चौथा नियम: आदत को संतोष देने वाला बनाइए
हमारा दिमाग तुरंत मिलने वाले संतोष को बहुत पसंद करता है। इसलिए हर अच्छी आदत के साथ कोई छोटा-सा इनाम जोड़िए। हर व्यायाम के बाद कैलेंडर में निशान लगाइए। किताब पढ़ने के बाद अपनी पसंद की चाय या कॉफी पी लीजिए। बचत करनी है, तो पारदर्शी डिब्बे में रोज़ कुछ पैसे डालिए।
जैसे संतोष मिलने पर अच्छी आदतें दोहराई जाती हैं, वैसे ही बुरी आदतों को छोड़ने के लिए उन्हें असंतोष से जोड़ना मददगार हो सकता है। उदाहरण के लिए, अगर आपने जंक फूड खाया, तो लिखिए कि आज मैंने अपनी सेहत को नुकसान पहुंचाया।
मैंने जेम्स क्लियर का एप- Atom अपने फोन में रखा है, इसमें आप अपनी 6 आदतें ट्रैक कर सकते हैं। आपको एप स्टोर और प्ले स्टोर में तमाम ऐसे एप्स मिल जाएंगे वरना आप कैलेंडर या डायरी में भी ये कर सकते हैं।
एक प्रतिशत नियम और पहचान का खेल
जेम्स क्लियर कहते हैं कि आज जो आदतें छोटी लगती हैं, वही कल आपकी पहचान बन सकती हैं। हर छोटा काम उस इंसान के लिए एक वोट होता है, जो आप बनना चाहते हैं। रोज़-रोज़ किया गया एक जैसा व्यवहार ही अंत में आपकी आइडेंटिटी बनाता है।
उनका मानना है कि सफलता किसी एक दिन में नहीं मिलती, बल्कि रोज़ की छोटी-छोटी जीतों का नतीजा होती है। आपको किसी और से बेहतर नहीं होना है बल्कि हर रोज़ खुद से एक प्रतिशत बेहतर होना है।
आदत बदलने का मतलब खुद पर दबाव डालना नहीं, बल्कि अपने माहौल को समझदारी से ढालना है। जब आप अपना माहौल सही बना लेते हैं, तो अच्छी आदतें अपने आप करीब आने लगती हैं और बुरी आदतें दूर होने लगती हैं।
कुल मिलाकर, एटॉमिक हैबिट्स यह नहीं सिखाती कि ज़िंदगी एक झटके में कैसे बदली जाए, बल्कि यह बताती है कि खुद को थोड़ा-थोड़ा कैसे बदला जाए- और वही बदलाव आखिरकार पूरी ज़िंदगी को बदल देता है।
इंटरनेशनल बेस्ट सेलर बुक ‘एटॉमिक हैबिट्स’ इंग्लिश के साथ हिंदी में भी उपलब्ध है। 256 पेज की ये किताब Manjul Publishing House से पब्लिश हुई है।
