राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी बोले- “असहिष्णु भारतीयों के लिए देश में कोई स्थान नहीं, वह राज्य असभ्य जहां महिलाओं का सम्मान नहीं”

यूनिवर्सिटी कैंपसों में स्वतंत्र चिंतन की वकालत करते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा कि अशांति की संस्कृति का प्रचार करने के बदले छात्रों और शिक्षकों को तार्किक चर्चा और बहस में शामिल होना चाहिए। मुखर्जी ने कहा कि वह ऐसी किसी समाज या राज्य को सभ्य नहीं मानते, अगर उसके नागरिकों का आचरण महिलाओं के प्रति असभ्य हो। उनकी टिप्पणी दिल्ली विश्वविद्यालय में एबीवीपी और आइसा के बीच जारी

गतिरोध और राष्ट्रवाद और स्वतंत्र अभिव्यक्ति को लेकर हो रही बहस की पृष्ठभूमि में आई है। प्रणब मुखर्जी ने कहा, “यह देखना दुखद है कि छात्र हिंसा और अशांति के भंवर में फंसे हुए हैं। हमारे प्रमुख उच्चतर शिक्षण संस्थान ऐसे यान हैं जिससे भारत खुद को ज्ञान समाज में स्थापित कर सकता है। शिक्षा के ऐसे मंदिरों में सृजनात्मकता और स्वतंत्र चिंतन की गूंज होनी चाहिए।” वहीं महिलाओं पर हमले, असहिष्णुता और समाज में गलत चलनों को लेकर भी राष्ट्रपति ने आगाह किया। उन्होंने कहा कि देश में “असहिष्णु भारतीय के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह राष्ट्र प्राचीन काल से ही स्वतंत्र विचार, अभिव्यक्ति और भाषण का गढ़ रहा है। अभिव्यक्ति और बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार हमारे संविधान द्वारा प्रदत्त सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मौलिक अधिकारों में से एक है। वैध आलोचना और असहमति के लिए हमेशा स्थान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारी महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकता में होनी चाहिए। किसी भी समाज की कसौटी महिलाओं और बच्चों के प्रति उसका रुख होती है। भारत को इस कसौटी पर नाकाम नहीं रहना चाहिए।”

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