केरल के तिरुनावाया में महामाघ उत्सव की शुरुआत हो गई है, जिसे केरल का कुंभ मेला भी कहा जा रहा है। दक्षिण की गंगा कही जाने वाली नीला (भरथपुझा) नदी के तट पर यह आयोजन 3 फरवरी तक चलेगा। इस महामहोत्सव का आयोजन जूना अखाड़ा और केरल भारतीय धर्म प्रचार सभा द्वारा किया जा रहा है।

महामाघ के नाम से मशहूर इस कुंभ मेले का इतिहास बेहद रोचक और प्राचीन है। मान्यता है कि भगवान परशुराम ने विश्व कल्याण के लिए अपना पहला बड़ा यज्ञ तिरुनावाया में किया था। यह यज्ञ भगवान ब्रह्मा के निर्देशन में हुआ था, जिसमें सभी देवताओं ने भाग लिया। यह आयोजन माघ मास में हुआ था, क्योंकि मान्यता है कि उस समय सात पवित्र नदियों का संगम भरथपुझा में होता है। यही यज्ञ आगे चलकर हर 12 वर्ष में दोहराया गया, जिसे बाद में महामाघ महोत्सव कहा जाने लगा।

कथाओं के अनुसार, परशुराम के पहले यज्ञ के बाद देवगुरु बृहस्पति इस उत्सव के पहले अधिष्ठाता बने। बाद के वर्षों में जब केरल में अलग-अलग राजाओं का शासन रहा, तो इस महायज्ञ की जिम्मेदारी स्थानीय शासकों को सौंप दी गई। कहा जाता है कि इस उत्सव में केरल की प्राचीन कलाएं, युद्ध कौशल, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और विद्वत चर्चाएं दिखाई जाती थीं। समय के साथ यह आयोजन दक्षिण भारत का एक बड़ा व्यापारिक मेला भी बन गया।

हालांकि, बाद के दौर में आपसी संघर्षों और अंग्रेजी हुकूमत के दौरान इस पवित्र उत्सव की भव्यता को काफी नुकसान पहुंचा। कई प्रतिबंध लगाए गए और धीरे-धीरे यह आयोजन कमजोर पड़ता चला गया। लेकिन अब एक बार फिर इस सांस्कृतिक पर्व को पुनर्जीवित करने की कोशिश की जा रही है।

प्रयागराज में आयोजित कुंभ मेले के दौरान जूना अखाड़े से जुड़े वरिष्ठ संत स्वामी आनंदवन भारती महाराज को दक्षिण भारत का महामंडलेश्वर नियुक्त किया गया था। इसके बाद उन्होंने तिरुनावाया में प्राचीन महामाघ महोत्सव को दोबारा भव्य रूप से आयोजित करने का निर्णय लिया और इसे ‘केरल का कुंभ मेला’ नाम दिया।

एक मान्यता यह भी है कि 1755 में अंग्रेजी हुकूमत ने इस महोत्सव पर रोक लगा दी थी। कहा जाता है कि अंग्रेजों को इस आयोजन में उमड़ने वाली भारी भीड़ से कानून-व्यवस्था बिगड़ने का डर था। उस समय अंग्रेजी हुकूमत दूसरे युद्धों में भी उलझी हुई थी और उसके पास सीमित संसाधन थे। इसी वजह से इस विशाल आयोजन को अनुमति नहीं दी गई। इसके बाद धीरे-धीरे लोगों की भागीदारी घटती चली गई और केरल का यह कुंभ अपनी चमक खो बैठा।

अब कई वर्षों बाद यह आयोजन एक बार फिर पूरी भव्यता के साथ किया जा रहा है। इस बार देश के अलग-अलग हिस्सों से आध्यात्मिक गुरु और श्रद्धालु इसमें भाग लेने के लिए पहुंच रहे हैं। खास बात यह है कि इस आयोजन के लिए स्थानीय लोगों ने राज्य सरकार से किसी तरह की आर्थिक मदद नहीं ली है, बल्कि पूरा खर्च वे खुद उठा रहे हैं।

इस भव्य आयोजन का असर सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि केरल की राजनीति में भी इसकी अहमियत मानी जा रही है। दरअसल, इस साल केरल में विधानसभा चुनाव होने हैं। केरल की लगभग 3.26 करोड़ की आबादी में 1.8 करोड़ से ज्यादा हिंदू हैं। आंकड़े बताते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव में एलडीएफ को करीब 45 फीसदी वोट मिले थे, जिनमें दलित और पिछड़े वर्गों का बड़ा समर्थन था। वहीं यूडीएफ को करीब 38 फीसदी वोट मिले थे। तीसरे स्थान पर बीजेपी-एनडीए रही थी, जिसे लगभग 12 फीसदी वोट मिले थे, जिनमें ब्राह्मण और कुछ शहरी समुदाय शामिल थे।

2024 के लोकसभा चुनाव में भी एनडीए के वोट शेयर में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। इसी वजह से केरल की राजनीति में हिंदू वोटरों को अहम माना जाता है, और तिरुनावाया में इतने बड़े कुंभ मेले के आयोजन को भी चुनावी राजनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।