Navratri 2019 Start Date, Muhurt, Durga Puja: नवरात्रि 29 सितंबर, रविवार से शुरू हो गई हैं। आश्विन प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर नवमी तिथि तक नवरात्रि है। इस दौरान मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाएगी। प्रतिपदा तिथि यानी 29 सितंबर को कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त है। इसी दिन कलश स्थापना के साथ देवी शैलपुत्री की पूजा भी होगी। फिर इसके बाद क्रमशः ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कत्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की पूजा होगी। 06 अक्टूबर को महाअष्टमी और 07 अक्टूबर को महानवमी पड़ेगी। इसके बाद 08 अक्टूबर को विसर्जन के साथ नवरात्रि का समापन होगा।
Navratri 2019 Date: Timings, Puja Vidhi
नवरात्रि का महत्व: (shardiya Navratri Significance) :
शारदीय नवरात्र का महत्व आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पहली तारीख से मनाया जाने वाला नवरात्रि का त्योहार सनातन काल से ही मनाया जा रहा है। ऐसी मान्यता है कि सबसे पहले भगवान राम ने नवरात्र की शुरुआत की थी। समुद्र किनारे शक्ति की उपासना करने के बाद ही भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई की थी। बाद में उन्होंने रावण का वध कर विजय भी प्राप्त किया। इसीलिए, नवरात्र के नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा करने के बाद दसवें दिन दशहरा का पर्व मनाया जाता है। इसे अधर्म पर धर्म की तथा असत्य पर सत्य की जीत के प्रतीक के तौर पर मनाया जाता है।
साल में सिर्फ दो नहीं चार बार होती है नवरात्रि की पूजा
आप हमारे इस लाइव ब्लॉग के जरिए नवरात्रि से जुड़ी हर जरूरी, पौराणिक, धार्मिक और राशियों की खबरें लगातार पाते रहिए…


नवरात्र के दौरान व्रत रखने वाले व्यक्ति को इन 9 दिनों में दाढ़ी-मूंछ, नाखून और अपने बाल नहीं कटवाने चाहिए। घर में कलश स्थापना, अखंड ज्योति या माता की चौकी रखी है तो कभी भी अपने घर को खाली छोड़कर न जाएं। नवरात्र को दौरान व्रत रखने वाले व्रती को काले कपड़े धारण करने और दिन में सोने से बचना चाहिए। नवरात्रि के दौरान पूरे नौ दिनों तक खाने में अनाज और नमक का सेवन नहीं करना चाहिए।
एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, लेकिन शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहां जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा। पूरी कथा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
दुर्गा सप्तशती का पाठ शुरू करने से पहले प्रथम पूज्य गणेश की पूजा करनी चाहिए। यदि घर में कलश स्थापन किया गया है तो पहले कलश का पूजन, फिर नवग्रह की पूजा और फिर अखंड दीप का पूजन करना चाहिए। दुर्गा सप्तशती पाठ से पहले दुर्गा सप्तशती की किताब को लाल रंग के शुद्ध आसन पर रखें। फिर इसका विधि-विधान पूर्वक अक्षत, चंदन और फूल से पूजन करें। इसके बाद पूरब दिशा की ओर मुंह करके अपने माथे पर अक्षत और चंदन लगाकर चार बार आचमन करें।
कलश को सभी देव शक्तियों, तीर्थों आदि का संयुक्त प्रतीक मानकर उसे स्थापित कर उसकी पूजा की जाती है। कलश में पवित्र जल भरा जाता है। जिसका मतलब होता है कि हमारा मन भी जल की तरह शीतल, स्वच्छ एवं निर्मल बना रहे। हमारे शरीररूपी पात्र हमेशा श्रद्धा, संवेदना और सरलता से भरे रहें। इसमें किसी भी तरह की कुत्सित भावनाएं क्रोध, मोह, ईर्ष्या, घृणा आदि ना पनपें।
किस दिन क्या संयोग - 29 सितंबर- सर्वार्थसिद्धि व अमृत सिद्धि योग 1 अक्टूबर- रवि योग 2 अक्टूबर- रवि योग व सर्वार्थ सिद्धि योग 3 अक्टूबर- सर्वार्थसिद्धि योग 4 अक्टूबर- रवि योग 6 अक्टूबर- सर्वार्थ सिद्धि योग 7 अक्टूबर- सर्वार्थ सिद्धि योग व रवि योग।
आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पहली तारीख से मनाया जाने वाला नवरात्रि का त्योहार सनातन काल से ही मनाया जा रहा है। ऐसी मान्यता है कि सबसे पहले भगवान राम ने नवरात्र की शुरुआत की थी। समुद्र किनारे शक्ति की उपासना करने के बाद ही भगवान राम ने लंका पर चढ़ाई की थी। बाद में उन्होंने रावण का वध कर विजय भी प्राप्त किया। इसीलिए, नवरात्र के नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा करने के बाद दसवें दिन दशहरा का पर्व मनाया जाता है। इसे अधर्म पर धर्म की तथा असत्य पर सत्य की जीत के प्रतीक के तौर पर मनाया जाता है।
लकड़ी की एक चौकी लें उसे शुद्ध जल से धोकर अच्छे से साफ कर उस पर गंगा जल छिड़क लें। – अब उसे एक साफ कपड़े से पोंछ कर उस पर लाल कपड़ा बिछा लें। – इसे कलश के दांयी तरफ रखें और उस चौकी पर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें। – मां को लाल चुनरी ओढ़ाएं और फूल माला भी चढ़ाएं। – माता के समक्ष धूप और घी का दीपक जलाएं। – अगर अखंड ज्योत जलाना चाहते हैं तो उसे भी जला लें। – देवी मां को तिलक लगाएं और उन्हें श्रंगार सामग्री (वस्त्र, सुहाग का समान, हल्दी, कुमकुम, सिंदूर, इत्र, काजल, महेंदी, चूड़ियां, मंगलसूत्र) अर्पित करें। – अब अपनी श्रद्धानुसार मां भगवती के मंत्रों का जाप करें और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। – अब एक मिटटी का पात्र लें उसमे आप गोबर के उपले को जलाकर अग्यारी जलायें घर के सभी सदस्यो के हिसाब से लॉन्ग के जोडे़ बनाये। लॉन्ग के जोड़े बनाने के लिए आप बताशे में लॉन्ग लगाएं (बताशे में दो लॉन्ग लगाकर एक जोड़ा माना जाता है) और जो लॉन्ग के जोड़े बनाये हैं फिर उसमे कपूर और सामग्री चढ़ाये और अग्यारी प्रज्वलित करे | – अंत में गणेश जी की आरती के बाद देवी अम्बे की आरती करें। – रोजाना सुबह और श्यान देवी माँ का पूजन करें तथा जौ पर भी जल का हल्का छिड़काव करते रहें।
नवरात्रि में सात्विक विधि से दस महाविद्या, भगवती काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी व कमला की अर्चना की जाती है।
नमो नमो दुर्गे सुख करनी । नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥ निराकार है ज्योति तुम्हारी । तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥
शशि ललाट मुख महाविशाला । नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥
रूप मातु को अधिक सुहावे । दरश करत जन अति सुख पावे ॥
तुम संसार शक्ति लय कीना । पालन हेतु अन्न धन दीना ॥
अन्नपूर्णा हुई जग पाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥
दुर्गा चालीसा संपूर्ण पाठ पढ़ें यहां
नवरात्रि के त्योहार की रौनक पूरे देश में देखने को मिलती है। उत्तर भारत में नौ दिनों तक देवी मां के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। भक्त इस दौरान दो या नौ दिनों तक व्रत रखते हैं। पहले दिन कलश स्थापना की जाती है और फिर अष्टमी या नवमी के दिन कुंवारी कन्याओं को भोजन कराकर व्रत खोला जाता है। इन नौ दिनों में रामलीला का मंचन भी किया जाता है। वहीं, पश्चिम बंगाल की बात करें तो वहां नवरात्रि के आखिरी चार दिनों यानी कि षष्ठी से लेकर नवमी तक दुर्गा उत्सव मनाया जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र में नवरात्रि के दिनों में डांडिया रास और गरबा डांस की धूम रहती है। राजस्थान में नवरात्रि के दौरान राजपूत अपनी कुल देवी को प्रसन्न करते हैं। तो वहीं तमिलनाडु में देवी के पैरों के निशान और प्रतिमा को झांकी के तौर पर घर में स्थापित किया जाता है, जिसे गोलू या कोलू कहते कहा जाता है। कर्नाटक में नवमी के दिन आयुध पूजा की जाती है। यहां के मैसूर का दशहरा काफी प्रसिद्ध है।
29 सितंबर 2019: नवरात्रि का पहला दिन, प्रतिपदा, कलश स्थापना और शैलपुत्री पूजन। 30 सितंबर 2019: नवरात्रि का दूसरा दिन, द्वितीया, बह्मचारिणी पूजन। 01 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का तीसरा दिन, तृतीया, चंद्रघंटा पूजन। 02 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का चौथा दिन, चतुर्थी, कुष्मांडा पूजन। 03 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का पांचवां दिन, पंचमी, स्कंदमाता पूजन। 04 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का छठा दिन, षष्ठी, सरस्वती पूजन। 05 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का सातवां दिन, सप्तमी, कात्यायनी पूजन। 06 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का आठवां दिन, अष्टमी, कालरात्रि पूजन, कन्या पूजन। 07 अक्टूबर 2019: नवरात्रि का नौवां दिन, नवमी, महागौरी पूजन, कन्या पूजन, नवमी हवन, नवरात्रि पारण।
व्रत रखने वाले जातक रोजना माता की सुबह शाम विधिवत पूजा कर आरती उतारें और उन्हें भोग लगाएं। सुबह माता की पूजा करने के बाद ही फलाहार करें। इस व्रत में नमक नहीं खाना चाहिए। शाम को फिर से माता जी की पूजा और आरती करें। इसके बाद एक बार और फलाहार कर सकते हैं। अगर फलाहार पर रहना संभव न हो तो शाम की पूजा के बाद एक बार भोजन कर सकते हैं। जानें नवरात्रि व्रत के अन्य नियम और विधि
- सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।।
- ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।।
कलश स्थापना के नियम: – इस बात का ध्यान रखें कि कलश स्थापना हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करें। – कलश स्थापित करने के लिए पूजन स्थल से अलग एक पाटे या पटरे पर लाल व सफेद कपड़ा बिछाएं। उस पर अक्षत से अष्टदल बनाकर जल से भरा कलश स्थापित करें। ध्यान रखें कि जल शुद्ध होना चाहिए। – कलश का मुंह कभी भी खुला न रखें, उसे हमेशा ढक कर रखना चाहिए। कलश को यदि किसी ढक्कन से ढका है, तो उसे साबुत चावलों के दाने से भर दें और उसके बीचों-बीच एक नारियल भी रखें। – अगर कलश की स्थापना कर रहे हैं, तो दोनों समय मंत्रों का जाप करें और दुर्गा चालीसा या सप्तशती का पाठ भी करें। – सुबह शाम पूजन करने के बाद मां को दोनों समय भोग लगाएं, भोग के लिए लौंग और बताशा सबसे उत्तमा माना गया है। – कलश स्थापित करने वाले लोग विधिवत नवरात्रि के नौ दिनों कर मां अम्बे की पूजा अर्चना करें और नवरात्रि के दशवें दिन घट विसर्जन कर दें।
माँ दुर्गा की चौकी स्थापित करने की विधि: नवरात्री के पहले दिन एक लकड़ी की चौकी लें। इसको गंगाजल से पवित्र कर लें और इसके ऊपर सुन्दर लाल वस्त्र बिछा लें। इसको कलश के दायीं और रखना चाहिए। उसके बाद माँ शेरावाली की धातु की मूर्ति अथवा नवदुर्गा की फोटो स्थापित करनी चाहिए। माँ दुर्गा को लाल चुनरी उड़ाए और उनसें नौ दिनों तक इस चौकी पर विराजने के लिए प्रार्थना करें। उसके बाद माँ को दीपक दिखाइए और धूप, फूलमाला, इत्र समर्पित करें। प्रसाद स्वरूप फल और मिठाई अर्पित करें।
29 सितंबर से नवरात्रि पूजा शुरू हो रही है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना और विधि विधान के साथ पूजा होती है। आइए जानते हैं कौन से हैं मां जगदंबा के वो नौ स्वरूप:
पहले दिन- मां शैलपुत्री
दूसरे दिन- मां ब्रह्मचारिणी
तीसरे दिन- मां चंद्रघंटा
चौथे दिन- मां कुष्मांडा
पांचवें दिन- मां स्कंद माता
छठे दिन- मां कात्यानी
सातवें दिन- मां कालरात्रि
आठवें दिन- मां महागौरी
नवें दिन- मां सिद्धिदात्री
नवरात्रि आज से शुरू हो रहा है। इसकी शुरुआत कलश स्थापना से हो रही है। आपको बता दें कि आज के दिन तीन शुभ संयोग पड़ रहे हैं। सर्वार्थ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग और द्विपुष्कर योग। इन सभी शुभ संयोग के साथ नवरात्रि पूजा शुरू हो रही है।
नवरात्रि पर इस बार कलश स्थापना के दिन सुखद संयोग स्थापित हो रहा है। इस दिन सुख समृद्धि के द्योतक माने जाने वाले ग्रह शुक्र का उदय हो रहा है। चूंकि शुक्र का संबंध देवी लक्ष्मी से है। नवरात्र में देवी के सभी नौ रूपों की पूजा होती है। शुक्र का उदित होना घर घर सुख समृद्धि धन धान्य को लाने का द्योतक है। अत: धन प्राप्ति के लिए नवरात्र में मां दुर्गा की उपासना करने वालों को लाभ मिल सकता है।
चौघड़िया मुहूर्त को किसी भी पूजा और शुभ कार्य के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। 29 सितंबर से नवरात्रि पूजा शुरू हो रही है। अश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को नवरात्रि की पहली पूजा है। इस दिन शुभ मुहूर्त में ही कलश स्थापना करनी चाहिए। आइए जानते हैं क्या है शुभ मुहूर्त:
लाभ-चौघड़िया- सुबह 09.18 से 10.48 तक।
अमृत- चौघड़िया- सुबह 10.48 से12.17 तक।
शुभ-चौघड़िया- 01.47 से 03.16 तक, शाम 06.16 से 07.46 तक।
अमृत चौघड़िया- रात्रि 07.46 से 09.16 तक।
अभिजीत-मुहूर्त- सुबह 11.53 से दोपहर 12.41तक।
नवरात्रि पर नौ दिन मां भगवती घर—घर आती हैं। उनकी उपासना और पूजा के लिए जरूरी है उनके सामने एक कलश भी रखा जाए। और उसकी कलश या घट की स्थापना भी अमृत मुहूर्त में ही किया जाए। इसके अलावा आपको कलश स्थापना के लिए ये जरूरी सामग्री का भी इंतजाम करना चाहिए। एक कलश पीतल का या मिट्टी का, नारियल, उस पर बांधने के लिए कलावा, 5, 7 या 11 आम के साफ पत्ते, कलश पर स्वास्तिक बनाने के लिए रोली, कलश में भरने के लिए शुद्ध जल और गंगा जल, केसर और जायफल जल में डालने के लिए, सिक्का, कलश के नीचे चावल या गेहूं।
नवरात्रि की पूजा और व्रत कल यानी 29 सितंबर से शुरू हो रही है। इस दौरान जहां नौ दिनों उपवास का विधान है वहीं पूरे नव दुर्गा अखण्ड ज्योति रखने को अनिवार्य बताया गया है। इसका उद्देश्य मां दुर्गा की कठिन साधना और नौ दिनों तक घर में प्रकाशमय रखना है। अखण्ड ज्योति को मां शक्ति का प्रतीक मानते हुए उसे बुझने नहीं दिया जाता।
आइए जानते हैं कि अखण्ड ज्योति के लिए क्या नियमों का पालन करना चाहिए: Click Here
पौराणिक मान्यता ये है कि जैसे ही एक तरफ श्राद्ध और पितरों को तर्पण देने का कार्य खत्म होता है, मां दुर्गा की पूजा शुरू हो जाती है। ये माना जाता है कि इसी दिन मां दुर्गा कैलाश पर्व से धरती पर प्रकट हुईं थीं। महालया के दिन से ही माता 10 दिनों तक धरती पर ही रहीं। यही वजह है कि इसी दिन से मूर्तिकार भी मां दुर्गा (Maa Durga) की आंखों पर काम शुरू करते हैं।
आमतौर पर हम सभी ये जानते हैं कि नवरात्रि की शुरुआत आश्विन प्रतिपदा तिथि से होती है। पर बंगाल के लोगों के लिए ये पूजा एक दिन पहले महालया (Mahalya) से शुरू हो जाती है।
बंगाल के लोगों के लिए महालया का विशेष महत्व है। साल भर इस दिन का इंतजार किया जाता है। महालया से दुर्गा पूजा की शुरुआत हो जाती है। माना जाता है कि इस दिन मां दुर्गा कैलाश पर्व से धरती पर आगमन करती हैं। ऐसे में 10 दिनों तक मां भक्तों के बीच रुकती हैं।
नवरात्र के समय तंत्र मंत्र का कई लोग इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में अंजान लोगों से ज्यादा न घुलें मिलें..कोई भी बाहरी चीज का ऐसे ही सेवन न करें।
कहा जाता है कि मां इन 9 दिनों में अपने भक्तों के घर आती हैं। ऐसे में साफ सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि मां स्वच्छता की तरफ ही अपने कदम बढ़ाती हैं। जहां मां के कदम धरती चूमते हैं वहां खुशहाली आती है। दरिद्रता का वास नहीं रहता।
माता के इन 9 दिनों में भूलकर भी किसी का दिल न दुखाएं। भूखे को खाना खिलाएं प्यासे को पानी पिलाएं। गरीब की मदद करें।
नवरात्रि में व्रत करें। अगर आपने व्रत नहीं लिया है तो सात्विक भोजन का सेवन करें। इसमें लहसुन और मांस-मदिरा से दूरी बनाएं।
आपसी कलह को दूर रखने की करें कोशिश..नवरात्रि के इन 9 दिनों में कोशिश करें कि लड़ाई झगड़े से दूर रहें। मन में किसी के लिए भी गलत भावना न आने दें।
मां के इन नौ दिनों में हमें पूजा अर्चना करते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखें- शास्त्रों के अनुसार कुछ नियमों का पालन करने से माता रानी खुश होती हैं और आशीर्वाद देती हैं। ब्रह्मचर्य का पालन करें, कलश स्थापति करने और जोत जलाने के बाद घर अकेला न छोड़ें..
पूजा करने के लिए तांत्रिक दुर्गा यंत्र का प्रयोग करें। मां दुर्गा की अराधना के लिए करें इस मंत्र का जाप..
सर्व मंगल मांगले शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्रियुम्बिके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते।।
या देवी सर्व भुतेसू लक्ष्मी रूपेण संस्थिता |
नम: तस्ये नम: तस्ये नम: तस्ये नमो नम:||
सूर्य उदय से पहले स्नान करें और साफ सुथरे कपडे़ पहनें। प्रार्थना की शुरुआत से पहले एक लकड़ी की सीट पर एक लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर मां दुर्गा की मूर्ति या फोटो स्थापित करें।
आगे पूजा की सामग्री रखें: रोली, मोली, लाल फूल, घी की मिठाई, दीया , दुर्गा चालीसा , आरती की पुस्तक
नवरात्रि पर प्रतिपदा तिथि को कलश स्थापना होगी। 29 सितंबर को कलश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त है। कलश स्थापना के दिन देवी शैलपुत्री की पूजा होगी। फिर इसके बाद क्रमशः ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कत्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री की आराधना की जाती है। 06 अक्टूबर को महाअष्टमी और 07 अक्टूबर को महानवमी पड़ेगी। 08 अक्टूबर को विसर्जन किया जाएगा।
नवरात्रि की पूजा 29 सितंबर से शुरू हो रही है। इसी दिन से मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा विधि विधान होती है। मंगल मुहूर्त में कलश स्थापना के साथ प्रतिपदा तिथि से पूजा शुरू होकर नवमी तिथि तक होती है। आपको बता दें कि नवरात्रि में मां के जिन नौ रूपों की उपासना और आराधना की जाती है वास्तव में वह नौ ग्रहों की पूजा है। आइए जानते हैं कैसे:
मां स्कंदमाता: यह देवी मां का पांचवां स्वरूप हैं। देवी स्कंदमाता बुध ग्रह को नियंत्रित करती हैं। इनकी आस्था से बुध ग्रह के बुरे प्रभाव से पार पाया जा सकता है।
मां कात्यायनी: देवी मां का छठा स्वरूप है ये। देवी कात्यायनी का ये स्वरूप बृहस्पति ग्रह का प्रतीक है। देवी की पूजा से बृहस्पति ग्रह को शांत किया जा सकता है।
मां कालरात्रि: देवी कालरात्रि मां दुर्गा का सातवां स्वरूप हैं और ये शनि ग्रह को नियंत्रित करती हैं।
मां महागौरी: ये मां अम्बे का आठवां स्वरूप है। देवी महागौरी राहु ग्रह को नियंत्रित करती हैं। इसलिए जिन राहु की महादशा हो वे इन देवी को अवश्य प्रसन्न करें।
मां सिद्धिदात्री: देवी के नौवें अवतार का नाम है देवी सिद्धिदात्री। ये केतु ग्रह को नियंत्रित करती हैं।
नवरात्रि की पूजा 29 सितंबर से शुरू हो रही है। इसी दिन से मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा विधि विधान होती है। मंगल मुहूर्त में कलश स्थापना के साथ प्रतिपदा तिथि से पूजा शुरू होकर नवमी तिथि तक होती है। आपको बता दें कि नवरात्रि में मां के जिन नौ रूपों की उपासना और आराधना की जाती है वास्तव में वह नौ ग्रहों की पूजा है। आइए जानते हैं कैसे:
मां शैलपुत्री: मां दुर्गा का प्रथम रूप है। मां शैलपुत्री चंद्रमा का स्वरूप दर्शाती हैं और इनकी पूजा से चंद्रमा से संबंधित दोष दूर होते हैं।
मां ब्रह्मचारिणी: मां दुर्गा का दूसरा स्वरूप है ब्रह्मचारिणी। यह मंगल ग्रह को नियंत्रित करती हैं। इसलिए मंगल ग्रह के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए इनकी आराधना करें।
मां चंद्रघंटा: मां दुर्गा का तीसरा स्वरूप हैं देवी चंद्रघंटा। यह शुक्र ग्रह को दर्शाती हैं। जिन पर शुक्र ग्रह का बुरा परिणाम हो वे देवी को प्रसन्न कर संकट मुक्त हो सकते हैं।
मां कूष्मांडा: देवी मां का चौथा स्वरूप है, मां कूष्माण्डा। यह सूर्य देव का मार्गदर्शन करती हैं। यानी सूर्य के कुप्रभावों से बचने के लिए इनके इस स्वरूप की आराधना करें।
नवरात्रि में मां दुर्गा की आराधना का आरंभ कलश स्थापना से ही किया जाता है। इसके लिए सभी जरूरी सामग्री जुटा लें और निर्धारित तिथि और मुहूर्त में ही आरंभ करें।
कलश स्थापना की तिथि: 29 सितंबर 2019
शुभ मुहूर्त: सुबह 06 बजकर 16 मिनट से 7 बजकर 40 मिनट तक
कुल अवधि: 1 घंटा 24 मिनट
Navratri 2019 start Date, Mantra, Puja Vidhi, Vrat and Aarti
सर्वाबाधा-विनिर्मुक्तो, धनधान्यसुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादेन् भविष्यति न संशयः।।
नवरात्रि के दौरान विधि पूर्वक इस मंत्र का जाप करने से सभी प्रकार के बाधाओं से मुक्ति मिलती है। साथ ही देवी दुर्गा की कृपा से घर में धन-धान्य की कमी महसूस नहीं होती है।
या देवी सर्वभूतेषु, लक्ष्मी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:।।
इस मंत्र का उच्चारण पूरे नवरात्रि पूजन के दौरान करने से मां दुर्गा की कृपा हासिल होती है। पूरे विधि विधान से मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित करने के साथ कलश स्थापना और षोडशोपचार विधि से मां की पूजा करने वाले भक्तों की मैया जरूर सुनती है।
नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन चंद्रघंटा, चौथे दिन कुष्मांडा, पांचवें दिन स्कंदमाता, छठे दिन कात्यायनी, सांतवें दिन कालरात्री, आठवें दिन महागौरी और नवमी को सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। प्रतिपदा तिथि यानी नवरात्रि का पहला दिन 29 सितंबर को घटस्थापना (कलश स्थापना) की जाती है। इसके लिए ब्रह्म मुहूर्त शुभ माना गया है। 3 अक्टूबर को ललिता पंचमी है, 6 अक्टूबर को महाष्टमी व 7 अक्टूबर को महानवमी का पर्व मनाया जाएगा।
सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भवष्यति न संशय॥
ऊं ऐं हृं क्लीं महासरस्वती देव्यै नमः।
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:।
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।।