महाभारत में हुए द्रौपदी के अपमान और चीरहरण को युद्ध की एक महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। पांडवों ने अपनी पत्नी द्रोपदी को द्रुयतक्रीड़ा में कौरवों के साथ दांव पर लगा दिया था। धर्मराज युधिष्ठर जो पांडवों के सबसे बड़े भाई माने जाते हैं वो इस खेल में द्रोपदी को कौरवों से हार गए थे। जब खेल खत्म हुआ तो कौरव वंशज दुर्योधन का भाई दुशासन द्रौपदी को उनके बाल पकड़ कर सभा में ले आया और कौरवों ने द्रौपदी का चीर हरण किया। द्रौपदी ने अपनी रक्षा के लिए भगवान कृष्ण से मदद की गुहार लगाई थी। तब भगवान कृष्ण ने उनकी लाज बचाई थी। दौपदी महकाली का रुप मानी जाती है और महाकाली पार्वती का ही एक रुप हैं। ऐसा माना जाता है कि पार्वती और भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण भाई-बहन थे और राखी का वादा उन्होनें चीरहरण के दिन निभाया था।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि महाभारत के पूरे युद्ध और कौरव वंश का अंत पहले से ही निश्चित था। पांचाल के राजा ने अपनी पुत्री को बचपन से ही हस्तिनापुर के अंत के लिए तैयार करना शुरु कर दिया था। मान्यताओं के अनुसार गुरु द्रौण ने पांचाल के राजा का अपमान किया था और उसी अपमान का बदला लेने के लिए पांचाल अध्यापति ने पांचाली के मन में नफरत भरी। ऐसा माना जाता है कि द्रौपदी महकाली का रुप थी। इसी के आधार पर माना जाता है कि अपने अपमान से पहले ही वो हस्तिनापुर का विनाश चाहती थीं।
पांचाली यानी द्रौपदी के चीर हरण के समय भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य, कुल गुरु कृपाचार्य और विदुर जैसे विद्वान भी मौन रह गए थे। क्योंकि द्युतक्रीड़ा में पांडव कौरवों से बाजी हार गए थे। फिर द्रौपदी ने भगवान कृष्ण से मदद की गुहार लगाई थी। तब भगवान कृष्ण ने उनकी लाज बचाई थी। कौरवों में सिर्फ एक ही व्यक्ति था जो द्रोपदी के चीर हरण का विरोध कर रहा था। दुर्योधन और दुशासन चीर हरण में लगे हुए थे जबकि उनका छोटा भाई विकर्ण विरोध कर रहा था। वह अपने भाईयों के चीर हरण के सख्त खिलाफ था। उसने अपने भाईयों को ऐसा नहीं करने की चेतावनी दी थी। उसने चेताया था कि ऐसा करना उनके पतन का कारण बन जाएगा और ऐसा हुआ भी।
