Navratri 2019, Durga Navami 2019 (Maha Navami) Puja Vidhi, Vrat Vidhi, Muhurat, Timings, Mantra: महानवमी 7 अक्टूबर को मनाई जायेगी। इस दिन देवी सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है। साथ ही नवमी हवन, कन्या पूजन और नवरात्रि व्रत का पारण भी नवमी के दिन ही किया जाता है। महानवमी के दिन हवन करना महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन देवी मां की विधि विधान पूजा करने से सारे दुख दूर हो जाते हैं और माता की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। जानिए महानवमी की पूजा विधि, मुहूर्त और कथा…
महानवमी तिथि और मुहूर्त: (Navratri MahaNavami, Tithi & Muhurt)
नवमी तिथि प्रारंभ – 06 अक्टूबर सुबह 10:54 AM से
नवमी तिथि समाप्त – 07 अक्टूबर सुबह 12:38 PM तक
नवमी तिथि हवन मुहूर्त – 07 अक्टूबर को प्रात: 06:22 से 12:37 तक
पारण का शुभ मुहूर्त: नवरात्रि पर पारण के लिए सबसे शुभ मुहूर्त नवमी तिथि समाप्ति यानि मध्याह्न 12:38 के बाद है।
नवमी पूजा विधि: नवमी के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है। इस दिन सुबह जल्दी उठ कर अच्छे से घर की सफाई कर लें। भोग तैयार करें। 9 कन्याओं और एक बालक को घर पर आमंत्रित करें आप चाहें तो मंदिर में भी कन्या पूजन कर सकते हैं। इस दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। घर के पूजा मंदिर में विधि विधान मां की पूजा करें। उनके समक्ष दीपक जलाएं। मां अम्बे को लाल रंग के फूल अर्पित करें। महानवमी के दिन मां अम्बे से फिर से पधारने की प्रार्थना कर उनकी विदाई की जाती है। इस दिन कलश के जल का छिड़काव पूरे घर में किया जाता है जिससे हर एक स्थान पवित्र हो जाए। मां के पूजन के समय अनाज के कुछ अंकुर मां को चढ़ाएं जाते हैं। कुछ अंकुर दैनिक पूजा स्थल पर रखे जाते हैं बाकी अंकुरों को प्रवाहित कर दिया जाता है। मां सिद्धिदात्री की पूजा से समस्त प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं।


देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
नवमी तिथि हवन मुहूर्त - 07 अक्टूबर को प्रात: 06:22 से 12:37 बजे तक
-मंत्र: ॐ सिद्धिदात्रै नमः। पूजन के समय इस मंत्र कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए।
देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था और इनकी कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में ‘अर्द्धनारीश्वर’ नाम से प्रसिद्ध हुए।
या देवी सर्वभूतेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।
मां सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करने वाली हैं। नवदुर्गा के इस अंतिम स्वरूप को श्रेष्ठ और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गाय है। जो श्वेत वस्त्रों में महाज्ञान और मधुर स्वर से भक्तों को सम्मोहित करती है। अगर भक्त मां सिद्धिदात्री की पूजा पूरी निष्ठा के साथ करे तो ये उन्हें सभी आठों सिद्धियां प्रदान करतीं हैं। इसके अलावा धार्मिक मान्यता यह भी है कि देवी सिद्धिदात्री भक्तों की 26 प्रकार की इच्छाएं पूरी करती हैं।
अब अकेली ही युद्ध में खड़ी हूँ। तुम भी स्थिर हो जाओ। तदनन्तर देवी और शुम्भ दोनों में सब देवताओं तथा दानवों के देखते-देखते भयंकर युद्ध छिड़ गया।। ऋषि कहते हैं – तब समस्त दैत्यों के राजा शुम्भ को अपनी ओर आते देख देवी ने त्रिशूल से उसकी छाती छेदकर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। देवी के शूल की धार से घायल होने पर उसके प्राण-पखेरू उड़ गये और वह समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतों सहित समूची पृथ्वी को कॅपाता हुआ भूमि पर गिर पड़ा।। तदनन्तर उस दुरात्मा के मारे जाने पर सम्पूर्ण जगत् प्रसन्न एवं पूर्ण स्वस्थ हो गया तथा आकाश स्वच्छ दिखायी देने लगा। पहले जो उत्पात सूचक मेघ और उल्कापात होते थे, वे सब शान्त हो गये तथा उस दैत्य के मारे जाने पर नदियां भी ठीक मार्ग से बहने लगीं।
माँ सिद्धिदात्री के बारे अनेक कथाएं प्राप्त होती हैं। जिसमें दुर्गा सप्तशती के कुछ प्रसंग माँ सिद्धि दात्री के विषय में बताते हैं। क्योंकि इन्हीं के द्वारा ही व्यक्ति को सिद्धि, बुद्धि व सुख-शांति की प्राप्ति होगी। और घर का क्लेश दूर होता है। पारिवार में प्रेम भाव का उदय होता है। अर्थात् यह देवी ही सर्वमय हैं, जिसे एक कथानक में देवी स्वतः ही स्वीकार किया है कि -इस संसार में मेरे सिवा दूसरी कौन है? देख, ये मेरी ही विभूतियाँ हैं, अतः मुझमें ही प्रवेश कर रही हैं। तदनन्तर ब्रह्माणी आदि समस्त देवियाँ अम्बिका देवी के शरीर में लीन हो गयीं। उस समय केवल अम्बिका देवी ही रह गयीं। देवी बोली- मैं अपनी ऐश्वर्य शक्ति से अनेक रूपों में यहाँ उपस्थित हुई थी। उन सब रूपों को मैंने समेट लिया।
जय सिद्धिदात्री तू सिद्धि की दाता
तू भक्तो की रक्षक तू दासो की माता
तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि,
तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि !!
कठिन काम सिद्ध कराती हो तुम ,
जभी हाथ सेवक के सर धरती हो तुम !!
तेरी पूजा मैं तो न कोई विधि है ,
तू जगदम्बें दाती तू सर्वसिद्धि है !!
रविवार को तेरा सुमरिन करे जो ,
तेरी मूर्ति को ही मन मैं धरे जो !!
तू सब काज उसके कराती हो पूरे ,
कभी काम उस के रहे न अधूरे !!
तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया ,
रखे जिसके सर पैर मैया अपनी छाया !!
सर्व सिद्धि दाती वो है भागयशाली ,
जो है तेरे दर का ही अम्बें सवाली !!
हिमाचल है पर्वत जहाँ वास तेरा ,
महा नंदा मंदिर मैं है वास तेरा !!
मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता ,
वंदना है सवाली तू जिसकी दाता !!
- सिद्धगंधर्वयक्षादौर सुरैरमरै रवि। सेव्यमाना सदाभूयात सिद्धिदा सिद्धिदायनी॥
- या देवी सर्वभूतेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।