नवरात्रि के आखिरी दिन महानवमी मनाई जाती है। इस दिन मां दुर्गा के सिद्धिदात्री रूप की उपासना की जाती है और नवरात्रि व्रत का पारण भी किया जाता है। हवन करने का भी इस दिन काफी महत्व माना जाता है। नवरात्रि के आखिरी दिन यानी नवमी को लोग नौ कन्याओं को भोजन कराकर अपना व्रत खोलते हैं। मां की इस रूप में उपासना करने से सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हो जाती है।
मान्यता है कि एक महिषासुर नाम का राक्षस था जिसने चारों तरफ हाहाकार मचा रखा था। उसके भय से सभी देवता परेशान थे। उसके वध के लिए देवी आदिशक्ति ने दुर्गा का रूप धारण किया और 8 दिनों तक महिषासुर राक्षक से युद्ध करने के बाद 9वें दिन उसको मार गिराया। जिस दिन मां ने इस अत्याचारी राक्षस का वध किया उस दिन को महानवमी के नाम से जाना जाने लगा। महानवमी के दिन महास्नान और षोडशोपचार पूजा करने का रिवाज है। ये पूजा अष्टमी की शाम ढलने के बाद की जाती है। दुर्गा बलिदान की पूजा नवमी के दिन सुबह की जाती है। नवमी के दिन हवन करना जरूरी माना जाता है। क्योंकि इस दिन नवरात्रि का समापन हो जाता है। मां की विदाई कर दी जाती है।
भविष्य पुराण में भगवान श्री कृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर के संवाद में दुर्गाष्टमी व नवमी के पूजन का उल्लेख मिलता है। मां अम्बे का पूजन अष्टमी व नवमी को करने से कष्टों का निवारण होता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। ये दोनों तिथि परम कल्याणकारी, पवित्र, सुख को देने वाली होती है। नौंवे दिन मॉ सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है। मॉ सिद्धिदात्री ने देवताओं और भक्तों के सभी मनोवांछित मनोरथों को सिद्ध कर दिया, जिससे पूरे जगत में इन्हें मां सिद्धिदात्री के रूप में जाना जाता है। इसलिए सिद्धिदात्री का पूजन व अर्चन करने से भक्तों के सारे मनोरथ सिद्ध होते हैं। इस साल नवरात्रि में महानवमी 6 अक्टूबर सुबह 10 बजकर 56 मिनट से शुरू होकर 7 अक्टूबर सुबह 12 बजकर 40 मिनट पर समाप्त होगी।

