सुप्रीम कोर्ट ने गर्भवती पत्नी को खुदकुशी के लिए मजबूर करने वाले एक आदमी को पांच साल की सजा दिए जाने के मामले में नरमी बरतने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि उसकी कहानी उन युवा महिलाओं की कहानी से मिलती-जुलती है जो ससुराल में मिली तकलीफों के कारण अपनी जिंदगी खत्म कर लेती हैं।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और न्यायमूर्ति शिवकीर्ति सिंह की पीठ ने कहा कि जीवन को लेकर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति और परिस्थितियों के कारण खुदकुशी करने को मजबूर 25 साल की युवती की कहानी उन बहुत सी युवतियों की कहानी जैसी है जो ससुराल की चारदीवारी के भीतर की अनकही तकलीफों और दिक्कतों के कारण अपनी जिंदगी खत्म कर लेती हैं। अदालत ने कर्नाटक के एक आदमी की अर्जी खारिज करते हुए ये टिप्पणियां कीं। इस आदमी ने भादंसं की धाराओं 498 ए (विवाहित महिला के साथ क्रूरता) और 306 (खुदकुशी के लिए उकसाना) के तहत अपराधों के लिए उसे दोषी ठहराने और पांच साल की कैद की सजा के हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।

शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह की महिलाएं अपने ससुराल में लंबी और खुशहाल शादीशुदा जिंदगी जीने की उम्मीद से कदम रखती हैं, लेकिन उनकी उम्मीद हमेशा लंबी नहीं चलती, न ही उनकी जिंदगी। याचिकाकर्ता और उसके माता-पिता को इस मामले में निचली अदालत ने बरी कर दिया था, लेकिन कर्नाटक हाई कोर्ट ने बाद में पति को दोषी ठहराया था। मृतका ने दोषी से 1991 में विवाह किया था और वह अपनी ससुराल में रह रही थी। नवंबर 1993 में आरोपी ने पुलिस को सूचना दी थी कि उसकी पत्नी की जहर खाने से मौत हो गई। अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट ने दोषी के इस स्पष्टीकरण को ठुकराकर सही किया कि उसकी पत्नी ने इसलिए खुदकुशी कर ली क्योंकि उसे उसकी मां के घर नहीं जाने दिया गया।