विमुद्रीकरण के मामले में रिजर्व बैंक को सरकार ने भरोसे में नहीं लिया था। ऐसा कर सरकार ने आरबीआइ एक्ट, 193 की धारा 26 (2) का उल्लंघन किया है। यह दावा करते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता और अधिवक्ता आदिल अल्वी ने अपनी याचिका में कहा है कि देश की मौद्रिक नीति पर खराब असर पड़ा है। यह नीति तय करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास है। सरकार ने जो घोषणाएं कीं, उनका सुझाव रिजर्व बैंक ने नहीं दिया था। दूसरी ओर, वामपंथी पार्टी माकपा ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर अपील की कि पांच सौ के नोटों पर से पाबंदी हटाने का निर्देश सरकार को दिया जाए।
माकपा ने कहा कि लोगों को यह छूट 30 दिसंबर या तब तक दी जाए, जब तक नए करेंसी नोट पर्याप्त उपलब्ध न हो जाएं। यह याचिका माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने दाखिल की है। सरकार से करेंसी उपलब्ध कराने की चरणबद्ध योजना की जानकारी देने की भी मांग की गई है। माकपा ने अपनी याचिका में कहा है कि आठ नवंबर को प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद से जो अफरा-तफरी फैली है, उससे स्पष्ट है कि सरकार की कोई तैयारी नहीं थी। उस दिन के बाद से एक के बाद एक नए नोटिफिकेशन और सर्कुलर जारी किए जा रहे हैं। परीक्षण और भूल के आधार पर ऐसा किया जा रहा है।
लोगों की जिंदगियों से खेला जा रहा है। विमुद्रीकरण के चलते नकदी और भुगतान का संकट खड़ा हो गया है। सरकार ने दो हजार रुपए का नोट जारी कर अपने दावों के उलट ही काम किया है। इन नोटों के चलन से काला धन और बढ़ेगा। माकपा महासचिव के मुताबिक, विमुद्रीकरण से काला धन, नकली नोट, भ्रष्टाचार और आतंकवाद पर अंकुश लगने के दावे गलत हैं। सरकार ने अदालत में भी माना है कि ज्यादातर काला धन विदेशी बैंकों में जमा है। उस धन पर कोई असर नहीं पड़ा है। ग्रामीण और खुदरा अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है और को-आॅपरेटिव बैंकिंग सेक्टर की कमर तोड़ दी गई है।
