सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर उत्तर प्रदेश सरकार को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वह कानून में संशोधन कर प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय को लोकायुक्त के दायरे में लाए। याचिका में कहा गया कि उत्तर प्रदेश लोकायुक्त व उप-लोकायुक्त अधिनियम, 1975 की मौजूदा स्थिति लोकायुक्त को पर्याप्त शक्तियां नहीं देतीं। जिस उद्देश्य और लक्ष्य के लिए इसे बनाया गया था। वकील शिव कुमार त्रिपाठी की तरफ से दायर जनहित याचिका में 43 साल पुराने कानून को संशोधित करने का निर्देश देने की मांग की गई है। जिससे भ्रष्टाचार की गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित करने के लिए मुख्यमंत्री को इसके दायरे में लाया जा सके।
याचिका के मुताबिक उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त किसी भी भ्रष्ट कार्यवाही में मुख्यमंत्री को पक्षपात, भाई-भतीजावाद या अक्षुणता दिखाने में विफल रहने की स्थिति में मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई के लिए सक्षम नहीं हैं, इसलिए मुख्यमंत्री को उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए लोकायुक्त के दायरे में लाने की जरूरत है। याचिका में यह मांग भी की गई है कि राज्य और डीम्ड विश्वविद्यालयों, निजी संस्थानों, समितियों, बोर्डों, आयोग, प्रदेश के कानूनों के तहत आने वाले प्रतिष्ठानों को भी लोकायुक्त अधिनियम के दायरे में लाने का निर्देश दिया जाए।

