गुजरात के दाहोद जिले में रहने वाले आदिवासी हर साल दिवाली से दो दिन बाद “गाई गोहरी” त्योहार मनाते हैं। इस पारंपरिक अनुष्ठान को मनाने का इनका अलग ही तरीका है। त्योहार को मनाने के लिए ये लोग सड़क पर लेट जाते हैं और गायों और बैलों को अपने ऊपर दौड़ाते हैं। भारत में गाय को मां के समान माना जाता है और पूजा की जाती है। लेकिन दाहोद के पास स्थित गरबदा गांव में मनाया जाने वाला वार्षिक उत्सव “गाई गोहरी” के जैसा शायद ही कोई हो। यह त्योहार हर साल दीपावली के ठीक दो दिन बाद मनाया जाता है, इस दिन को हिंदू नववर्ष के रूप में भी माना जाता है।

दिवाली से एक दिन बाद गांव का मुखिया एक पूजा का आयोजन करता है। देवता की पूजा करने के बाद सभी जानवरों को रंगा जाता है और मोर के पंखों से सजाया जाता है। गायों और बैलों के पांव में घंटियां बांधी जाती हैं। सकड़ों सालों से चली आ रही इस परंपरा में जान जाने तक का जोखिम है। त्योहार वाले दिन सभी गायों और बैलों को सड़क पर दौड़ाया जाता है, जहां सभी श्रद्धालु लेटे होते हैं। इस खतरनाक परंपरा को निभाने का उद्देश्य अपने देवता के प्रति आभार प्रकट करना होता है।

वीडियो में देखिए, दिवाली मनाने के बाद सड़कों पर पड़े हैं कूड़ों के ढेर

एक मान्यता यह भी है कि ऐसा करने से लोगों द्वारा जानवरों पर किए गए अत्याचार का प्रायश्चित भी होता है। एक स्थानीय निवासी सलरा बेन गोहिल ने बताया, “यह परंपरा और विश्वास का प्रतीक है। हम गायों की पूजा करते है और उन्हें मां के समान मानते हैं। वह हमें किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचा सकती।” यह त्योहार सिर्फ गुजरात नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में भी मनाया जाता है। गायों को रंग बिरंगे रंगों और सामग्री से सजाया जाता है और त्योहार के दिन शहर के मुख्य मार्ग से निकाला जाता है। मन्नत मांगने वाले लोग मवेशियों के झुंड के आगे औंधे मुंह लेटकर मन्नत करते हैं। वीडियो और तस्वीरों में देखें इस त्योहार की कुछ झलकियां-