आनुवांशिक रूप से संशोधित (जेनेटिक मॉडिफाइड यानी जीएम) खाद्य पदार्थों को भारत में सरकारी मंजूरी के बिना बेचा नहीं जा सकता और न ही इसका व्यापार किया जा सकता है। लेकिन सेंटर फोर साइंस एंड एंवॉयरमेंट (सीएसई) के ताजा अध्ययन में पाया गया कि ऐसे पदार्थों को देश में अवैध रूप से बड़े पैमाने पर बेचा जा रहा है। जीएम लेबलिंग या तो मौजूद नहीं है या फिर इसे लेकर गलत जानकारी और झूठे दावे किए जा रहे हैं। इसको लेकर सीएसई ने कई सवाल उठाए हैं। अध्ययन में घरेलू उत्पाद और आयातित खाद्य तेलों, संशोधित व पैक किए गए खाद्य पदार्थों और शिशु खाद्य पदार्थों पर परीक्षण किए गए। जीएम के लिए किए गए परीक्षण में 32 फीसद नमूने सकारात्मक पाए गए। इन नमूनों में 80 फीसद उत्पादों का आयात किया गया था। अधिकतर जीएम खाद्य पदार्थों के लेबल पर उनके जीएम होने को नहीं दर्शाया गया और कुछ ने जीएम मुक्त होने के झूठे दावे भी किए हैं। सीएसई के पदाधिकारियों ने आरोप लगाए हैं कि भारतीय खाद्य सरंक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) जीएम भोजन की निगरानी करने में लापरवाह है। यह अवैध बिक्री को रोकने में असफल रहा है। जीएम भोजन की लेबलिंग को लेकर इसके मसौदे के नियम कमजोर हैं और लागू करने के लिहाज से अव्यावहारिक हैं। सीएसई ने सिफारिश की है कि एफएसएसएआइ को जरूरी अनुमोदन प्रक्रियाएं निर्धारित करनी होंगी और यह कड़े लेबलिंग मानक तैयार करने होंगे। इसके साथ ही जीएम खाद्य पदार्थों की जांच के लिए प्रयोगशालाएं स्थापित करने और ऐसे खाद्य पदार्थों को अवैध रूप से बाजार में लाने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी।

भारत के लिए अपनी तरह के पहले अध्ययन में सीएसई ने जीएम खाद्य पदार्थों की अवैध उपस्थिति और बिक्री का खुलासा किया है। एफएसएसएआइ की मंजूरी के बिना इन खाद्य पदार्थों का उत्पादन, बिक्री और आयात प्रतिबंधित है। सीएसई की प्रदूषण निगरानी प्रयोगशाला (पीएमएल) ने यह अध्ययन किया। इस दौरान भारतीय बाजारों में उपलब्ध 65 खाद्य उत्पादों का परीक्षण किया गया जिनमें से 32 फीसद जीएम सकारात्मक पाए गए। इन खाद्य उत्पादों को दिल्ली-एनसीआर, पंजाब और गुजरात में खुदरा दुकानों से खरीदा गया था। आयातित (35) और घरेलू रूप से उत्पादित (30) नमूनों का परीक्षण किया गया। प्रदूषित उत्पाद में शिशु भोजन, खाद्य तेल और पैक किए गए खाद्य स्नैक्स शामिल हैं। इनमें से अधिकतर अमेरिका, कनाडा, हॉलैंड, थाईलैंड और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से आयात किए जाते हैं। ये उत्पाद सोया, कपास बीज, मकई या रैपसीड (कैनोला) से उत्पन्न होते हैं जिन्हें दुनिया की जीएम फसलों के रूप में जाना जाता है। अध्ययन के नतीजों को जारी करते हुए सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा कि हमारा सरकार का कहना है कि उसने जीएम खाद्य उत्पादों के आयात की अनुमति नहीं दी है तो यह कैसे हो रहा है? हमने पाया है कि कानून समस्या नहीं है बल्कि इसके लिए नियामक एजंसियां जिम्मेदार हैं। सीएसई के उपमहानिदेशक चंद्र भूषण ने कहा कि हम जीएम खाद्य पदार्थों के भारतीय बाजार में प्रवेश संबंधी पैमाने को जानकर भौचक्के रह गए। एफएसएसएआइ ने किसी भी जीएम भोजन को कागज पर अनुमति नहीं दी है, लेकिन यह प्राधिकरण इसकी अवैध बिक्री को रोकने में असफल रहा है।

जीएम क्या है? हमें चिंता क्यों करनी चाहिए?
नारायण का कहना है कि जीएम उत्पाद विशेष रूप से भोजन, सुरक्षा का पर महत्त्वपूर्ण सवाल उठाते हैं। सवाल यह है कि वे कितने सुरक्षित हैं। इस पर फिलहाल निर्णय नहीं लिया जा सका है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जीएम भोजन में विभिन्न जीवों से जीन (डीएनए) लेना और उन्हें खाद्य फसलों में डालना शामिल है। एक चिंता यह है कि यह विदेशी डीएनए विषाक्तता, एलर्जी प्रतिक्रियाओं, पोषण और अन्य प्रभावों जैसे जोखिम पैदा कर सकता है। भारत समेत दुनिया के अधिकांश देशों ने जीएम भोजन के लिए सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने का फैसला किया है। उन्होंने अनुमोदन और लेबलिंग के लिए कड़े नियम निर्धारित किए हैं। यूरोपीय संघ, आॅस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, ब्राजील और दक्षिण कोरिया ने जीएम भोजन को लेबल करना अनिवार्य बना दिया ताकि उपभोक्ताओं के पास खाने का चुनाव करने का विकल्प हों।